चन्द्रशेखर का अवसान- एक युग का समापन

जुलाई 11, 2007 at 5:30 अपराह्न (कुछ इधर की कुछ उधर की)

अध्यक्ष जी का देहावसान हिन्दुस्तान की राजनीति के छायादार बरगद के पेड़ का गिरना है/ एक ऐसा पेड़ जिस पर लोग आशा की दृष्टि से देखते थे/ राष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी राय ली जाती थी और गुनी जाती थी/ तेजी से क्षरित होते जाते राजनीतिक मूल्यों के इस दौर में अध्यक्ष जी उन चन्द नेताओं में थे जिनके लिए लोगों के दिलों में सम्मान था, जिनकी तरफ़ आशा और अपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता था/ युवा तुर्कों की तिकड़ी के नेता कांग्रेस के उस हरावल दस्ते में शामिल थे जिसने कांग्रेस के भीतर रहकर इमर्जेन्सी का विरोध किया/ भले ही इसके चलते उन्हें जेल भेज दिया गया/
चन्द्रशेखर की राजनीति के स्टाइल और तरीके को लेकर भले ही कई मत प्रतिमत रहे हों मगर उनका सुदीर्घ और बेदाग़ संसदीय जीवन अपने आप में सम्मान और श्लाघा का विषय है/
यह बात चन्द्रशेखर में ही थी कि सांसद गण दलीय सीमाओं से परे उनका सम्मान करते थे/ संसद की कार्यवाहियों के सजीव प्रसारणों में कई बार अध्यक्ष जी को संसद को दिशा देते हुए और घर के बुजुर्ग की भूमिका में देखा/ बुजुर्ग भी ऐसा जो वास्तव में मर्यादा और नीतियों का पक्षधर हो न कि सिर्फ़ लीक पीटने वाला लकीर का फ़कीर/
यही वजह थी कि अध्यक्ष जी जब भी संसद में बोलते थे तो सारी संसद उन्हें सुनती थी/ यह बात शायद अटल जी के साथ भी नहीं है क्यों कि उन्हें भाजपा का नेता माना जाता है जबकि चन्द्रशेखर अपनी पार्टी के अकेले सांसद होने के नाते निर्गुट किस्म के नेता हो गए थे/
मुझे याद पड़ता है टी.वी. पर सजीव प्रसारण के दौरान देखा था कि एक बार जब NDA सरकार के रक्षा मन्त्री जॉर्ज फ़र्नांडिस किसी मुद्दे पर आग उगल रहे थे और वामपन्थी दूसरे तरफ़ प्रतिरोध के स्वर में मुखर थे, तब संसद में अत्यन्त अप्रिय स्थिति पैदा हो गई थी/ तब चन्द्रशेखर ने बात सम्हाली थी/ ऐसे तमाम हालातों में चन्द्रशेखर उठते थे, संसद को समझाइश देते थे और बाकी संसद उनके द्वारा दी गई व्यवस्थाओं को मानती भी थी/ एक बार अध्यक्ष जी किसी सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के मुद्दे पर बोल रहे थे इतने में कोई नए सांसद गणों ने कुछ कमेंट कर दिया/ अध्यक्ष जी ने तुरन्त कहा कि अब आप ही बोल लें मैं बैठा जाता हूँ/
जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते अध्यक्ष जी का सम्बोधन उनके साथ चस्पा हो गया/
मात्र ५० की उम्र में इतने बड़े गठबन्धन जैसे पार्टी का नेतृत्व चन्द्रशेखर के बस की ही बात थी/ एक पुस्तक पढ़ी है हिमाचल के पूर्व मुख्यमन्त्री शान्ताकुमार जी की/ उसमें वे कहते हैं चन्द्रशेखर पार्टी को टूट से बचाना चाहते थे मगर कोई उनकी सुनता ही नहीं था/ विशेषकर राजनारायण और मधु लिमये जैसे दिग्गज/
बहरहाल वह प्रयोग देश की राजनीति को एक अलग दिशा तो दे गया/ नए समीकरण बने और यह सिद्ध हुआ कि देश की सबसे बड़ी पार्टी को सत्ता से बेदखल भी किया जा सकता है/ उस दौर ने मुल्क को तमाम क्षेत्रीय क्षत्रप और राष्ट्रीय दिग्गज दिए/ उनमें से कई अब भी राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं/
चन्द्रशेखर की बड़ी बात उनका देशज मिजाज़ और भारतीयता से जुड़ाव था/ वैश्वीकरण के मुद्दे पर वे आखिर तक असहमत रहे और झंडा बुलन्द किये रहे/ यह सब सिद्धान्तों के राजनीति करने वालों के आखिरी दस्ते के संसदीय सेनानी थे/
विरोध यानि कि खुला विरोध गुपचुप विरोध अध्यक्ष जी की फ़ितरत नहीं थी/ राजा मांडा के प्रधानमन्त्री बनते वक़्त भी चन्द्रशेखर ने विरोध किया और सहमति का लबादा नहीं ओढ़ा/ वी.पी.सिंह अपनी आत्मकथा “मन्ज़िल से ज़्यादा सफ़र” में इस बात का उल्लेख करते हैं कि चन्द्रशेखर संसदीय दल की बैठक से उठ कर चले गए थे/
एक कमज़ोर सी सरकार का मुखिया बहुत कुछ कर नहीं सकता और चन्द्रशेखर के साथ भी ऐसा ही हुआ/ उनके खाते में वित्तीय कुप्रबन्धन की शिकायतें हैं और उन्हीं के समय में हिन्दुस्तान का सोना विदेश में गिरवी रखा गया/ मगर उन्हीं के समय में कहा जाता है कि अयोध्या विवाद सुलझने के कगार पर पहुँच गया था/ महन्त रामचन्द्रदास, संघ और अन्य पक्षों के साथ बैठकर एक सामान्य सर्वानुमत रास्ता निकालने का पथ प्रशस्त हो रहा था मगर तब तक सरकार का पतन हो गया/ बड़े लोगॊ के बड़े खेल! अगर विवाद के हल वाली बात सही मानी जाए तो कभी कभी सोचता हूँ कि क्या इन दोनॊ घटनाओं के बीच कोई सहसम्बन्ध है? ये सब घटनाएं इतिहास के गर्त में खो जाती हैं/
अपने अन्तिम दिनों में अध्यक्ष जी को देखना एक शेर को तिल तिल कर मौत के तरफ़ बढ़ते हुए देखना था बीमारी से वे अत्यन्त कमज़ोर हो गए थे, मगर वे लड़ते रहे/ आगरा में मेरे एक मित्र हैं उनके मित्र के पिता अध्यक्ष जी के मिलने वालों में से हैं, वे बताते हैं कि जिस आदमी की दहाड़ ताउम्र आप सुनने के अभ्यस्त रहे हों उसे धीमे धीमे बोलते सुनना कारूणिक रूप से दुखद है/ कीमियोथेरेपी से भी अध्यक्ष जी ज़्यादा दिन नहीं चल सके/ मौत आनी ही थी/ बहुत लोगों के लिये चन्द्रशेखर का निधन एक पूर्व प्रधानमन्त्री का देहावसान है, बहुतों के लिए एक राजनेता का/ मगर मेरे लिए चन्द्रशेखर राजनीतिज्ञों की उस विरल होटि हुई नस्ल के आदमी थे जो मुल्क का दिल जानती थी/
आज हिन्दुस्तान के दिल को जानने वाले और आत्मा को पहचानने वाले कितने नेता बचे हैं? जो लोग समझने पहचानने का दावा करते हैं वे सिर्फ़ चुनाव जीतने को अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं/
किसी भी मुल्क का इतिहास बहुत बड़ा होता और हिन्दुस्तान जैसे मुल्कों का इतिहास तो अत्यन्त विस्तृत और गहन होता है/ मगर फ़िर भी कुछ लोगों का जीवन इतिहास के पत्थर पर लकीर खींच जाता है/ चन्द्रशेखर ने यह लकीर सत्ता के माध्यम से नहीं खींची इसलिए यह और अधिक महत्वपूर्ण और सम्मानित है/ उनके जीवन के कुछ साल ट्रेजरी बेन्च पर बैठने वाले छोड़ दें तो ताउम्र विपक्ष में बैठने वाले चन्द्रशेखर मूल्यों और आदर्शों की प्रतिबद्ध राजनीति के नाविक थे/
म्रूत्यु के पहले वे श्रद्धेय थे अब स्मरणीय हो गए हैं/

3 टिप्पणियाँ

  1. सृजन शिल्पी said,

    अच्छे शब्दों में श्रद्धांजलि दी है आपने, अध्यक्ष जी को। आभार

  2. Arvind chaturvedi said,

    श्री चन्द्रशेखर ने अपनी साफगोई, निर्भीकता, निस्पक्षता की एक मिसाल कयम की है जिसका कोई सानी नही है. कुछ भ्रमित व्यक्तियों के प्रलाप को अपवाद स्वरूप छोड दें तो भारतीय राजनीति को समझने वालों के लिये चन्द्रशेखर एक आदर्श राजनेता थे.
    इस प्रकार के राजनेताओं की नस्ल धीरे धीरे भारतीय राजनीतिक पटल से लुप्त होती जा रही है. संसद में अपने राष्ट्रवादी विचारों को रखने के लिये चन्द्रशेखर जी सदैव याद किये जायेंगे.

    मेरी श्रद्धांजलि.

  3. विकास said,

    भास्कर जी आपका यह लेख एक सच्ची श्रद्धांजली चन्द्रशेखर जी को…हिन्दुस्तान की राजनीति के छायादार बरगद चन्द्र शेखर सिंह के दूसरी पुण्य तिथि पर स्मृति वन स्थित समाधी स्थल पर सभी दल के नेताओं के साथ-साथ आम लोगो ने श्रद्घांजलि अर्पित किया… पूर्वी उत्तरप्रदेश के इब्राहिमपट्टी का एक कृषक परिवार में उनका जन्म १९२७ में हुआ था…भारतीय राजनीति के इस युवातुर्क का देहावसान ८ जुलाई २००७ में नई दिल्ली के एक अस्पताल में हो गया था… चन्द्रशेखर मूल्यों और आदर्शों की प्रतिबद्ध राजनीति के नाविक थे…

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