बाइ कास्ट क्या हैं आप?

मई 26, 2007 at 4:14 पूर्वाह्न (कुछ इधर की कुछ उधर की)

कुछ दिन हुए केरल के एक प्रख्यात मन्दिर में एक केन्द्रीय मन्त्री के आगमन के उपरान्त मन्दिर को धोया गया पवित्र किया गया/ तर्क यह दिया गया कि चूँकि मन्त्री महोदय की पत्नी ईसाई हैं इसलिए वे और उनकी सन्तानें अपवित्र हैं/ मन्त्री महोदय ने बाद में कहा कि इस प्रकार से तो मेरी सन्तानें और वन्शज कभी किसी मन्दिर में जा ही नहीं पाएंगे/

ऐसी कोई पहली घटना हो ऐसा नहीं है इसके पहले भी कई बार इस प्रकार की घटनाएँ विशेषकर दक्षिण भारत के मन्दिरों में हुई हैं/ एक तरफ़ तो हिन्दू धर्म अपने को विस्तृत और उदार होने का दावा करता है और वास्तव में ऐसा बहुत हद तक है भी कम से कम उपनिषद्‌ और वेद तो ऐसा कहते ही हैं और दूसरी तरफ़ जब आचार क्रिया की बात आती है तब बिल्कुल उल्टा हो जाता है/ ब्रहम सत्यं जगन्मिथ्या का नारा बुलन्द करने वाले लोग खूब माया जोड़ने में लगे रहते हैं/

बहरहाल ऐसी घटनाओं के बाद किसी आदमी का स्वाभिमान शायद उसे विवश करेगा कि वो अपना धर्म बदल ले/ तब फ़िर हिन्दुत्व के ध्वजवाहक खूब शोर मचाएंगे/ हम धर्मान्तरण पर तो खूब बहस करते हैं और हल्ला करते हैं मगर उन दलितों और जनजातीय लोगों के लिए मन्दिरों के दरवाज़े खोलने में अब भी आनाकानी करते हैं, जो सैकड़ों सालों से हिन्दू धर्म की ध्वजा घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में फ़हराते चले आ रहे हैं/ कभी कभी मैं सोचता हूँ कि अगर ईसाई मिशनरी दवाई की गोलियाँ बाँटकर लोगों को क्रिश्चियन बना लेते हैं तो उसमें क्या बुराई है/ हमने तो उन्हें इतनी भी सहूलियत मुहैया नहीं कराई/

हालाँकि मैं जानता हूँ धोखे से या बलात धर्मान्तरण निश्चित रूप से कोई श्लाघ्य कर्म नहीं है मगर क्या हिन्दू धर्म में बने रहने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन्हीं की या फ़िर धर्मध्वजियों और विद्वानों की भी है/ हमने सिर्फ़ जाति विशेष को वन्चित रखा हो ऐसा नहीं है/ आबादी की आधी हिस्से महिलाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ है/ उज्जैन के महाकालेश्वर की भस्म आरती में महिलाओं को शामिल होने की अनुमति नहीं है/ कई सारे देवी देवता ऐसे हैं जो महिलाओं के छूने से अपवित्र हो जाते हैं फ़िर दलित और गैर हिन्दुओं की बात ही क्या/ ज़रा हिन्दू धर्म की पुनुरुत्थान वाले भाई लोग बताएंगे क्या कि आखिर कौन सा एजेन्डा हिन्दुत्व का पुनुरुत्थान कर सकता है?

हम यह तो चाहते हैं कि सब हिन्दू धर्म का सम्मान करें इसमें कोई आपत्ति है भी नहीं मगर जब भी सड़े-गले मवाद को कोई मसकता है तो बहुतों को दर्द होता है/ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने अपने प्रख्यात पुस्तक “कबीर” में लिखा है कि हिन्दुओं पर जब निरन्तर आक्रमण होते रहे तब उन्होंने अपने आप को एक सीमित दायरे में संकुचित रखने को अपना धर्म मान लिया/ इस की वजह यह रही कि उनके पास शायद उस समय और कोई विकल्प रहे ही नहीं होंगे/ मुझे छुओ मत वाली नीति अपना के रखने के सामाजिक और आर्थिक परिणाम अभी तक भुगतने पड़ रहे हैं/

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी भी अपने प्रख्यात निबन्ध “कछुआ धर्म” में यही बात कहते हैं कि हमारा धर्म कछुए के समान है जरा कुच हुआ नहीं कि खोल में सरक गए फ़िर जै राम जी की दुनिया में कुछ हुआ करे/ अपन ब्रह्म और माया के चिन्तन में व्यस्त/

मुझे प्रायः ऐसा लगता है कि हमारे धर्म में ढोंग बहुत है/ अब भई कोई मुझे लाठी ले के न दौड़ पड़ना कि तुमने हिन्दू धर्म के बारे में ऐसा कहने की हिम्मत कैसे की/ दूसरे धर्म के बारे में कह के बताते हिम्मत है तो/

तो उन लोगों का जवाब किसी दिन विस्तार से लिखूँगा अभी इतना कह दूँ कि जिस धर्म को मैने देखा समझा और जाना है उसी के बारे में तो लिख सकता हूँ/ आदमी अपने परिवार के बारे में ही लिख सकता है न कि पड़ोसियों के बारे में/ ढोंग इस मायने में कि पानी छान के पीने वाले लोग बेईमानी करने में ज़रा कोताही नहीं करते /गरीब को पटखनी देते रहने में हम ज़रा भी कमी नहीं करते/ ऐसे एकाध नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं जिन पर विस्तृत चर्चा की जा सकती है/

उपनिषद्‌ तो कहते हैं त्वं हि स्त्री त्वं हि पुमो॓ऽसि यानि कि तुम ही स्त्रि हो और तुम ही पुरुष/ आदि शंकराचार्य महाराज भी ऐसा ही कुछ कहते हैं अपने निर्वाण षटक्‌ में- “मनोऽबुद्धिऽहंकार चित्तानि नाहम्‌ चिदानन्द रूपं शिवोऽहम्‌ शिवोऽहम्‌” इसी में आगे कहा गया है कि “न मे राग द्वेषो न मे जाति भेदः” न मुझे राग है न द्वेष न जातिभेद/ मगर हम करेंगे ऐसा ही कि जब ट्रेन में कोई आदमी मिलता है तो उससे पूचे बिना रहा ही नहीं जाता कि भाई कौन ठाकुर हो या थोड़ा पढा लिखा आदमी हुआ तो पूछता है “बाइ कास्ट क्या हैं आप?” ये काल्पनिक उदाहरण सुने सुनाये नहीं दे रहा हूं बल्कि ये सब घटित हुए हैं मेरे साथ/ हममें से बहुतॊ ने इस अनुभव को सहा होगा/

यहाँ कोई दलित विमर्श का नाटक अपन नहीं करने जा रहे/ सीधी बात सीधे लफ़्ज़ों में/ अभी कुछ दिन पहले मैं एक टूर पर था तो साथ के सज्जन ने आखिर कार पूछ ही लिया आप बाइ कास्ट क्या हैं? हो सकता है ये प्रश्न शायद यु.पी.एस.सी. के पेपर में आने वाला हो और उनका कोई दूसरा मन्तव्य न रहा हो/ मगर मैं ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में बड़ा अचकचाता हूँ इसलिये नहीं कि मैं किसी कथित नीची या ऊँची जाति से ताल्लुक रखता हूँ बल्कि इसलिए कि यह प्रश्न बहुत ही भौंडा मुझे लगता है/

खैर यह हमारी कथनी और करनी का अन्तर है/ इसमें ज़्यादा क्या बोलूँ/ हमारे इलाकों में आज भी चमार-भंगी एक गाली के तौर पर इस्तेमाल होती आ रही है हमारे सामाजिक परिवेश में? एक घटना याद आ रही है/ हुआ यूँ कि मेरे ओफ़िस के कम्प्यूटर ऑपरेटर से कुछ बात चलते चलते बात जाति के मुद्दों पर आगई/ उसने कहा कि हमारे पूर्वज जो नियम बना गये वे बेवकूफ़ थोड़े ही थे/ हमको उन नियमों को बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए/ यह तर्क प्रायः वे सब लोग दिया करते हैं जिनके पास खुद के विचार नहीं होते/ मेरे द्वारा इस तर्क का प्रतितर्क दिये जाने पर उसने कहा सर आप कौन सी कास्ट के हैं तब मैं आपसे और ज़्यादा इस मुद्दे पर चर्चा कर सकता हूँ? मैंने कहा फ़िर हमें इस मुद्दे पर चर्चा बन्द कर देनी चाहिए/

बहुत बार लोगों को मैने यह भी कहते सुना है कि हम तो कोई फ़रक नहीं करते मानो उन्हें फ़र्क करने का ईश्वर-प्रदत्त अधिकार प्राप्त हो और इस अधिकार का इस्तेमाल न करके वे कोई एहसान कर रहे हों/ ौनको ऐसा कहते कई बार सुना है कि हम तो दलितों के साथ बैठ के खाना खा लेते हैं/ कुछ लोग बड़े गर्व के साथ ये भी कह्ते हैं कि हमारे घर में अगर पता चल जाए कि हम चमार के साथ बैठे थे तो हमको घर वाले नहलवा दें / इन सब बयानों और बातों में जो underlying assumption है वो ये कि हम दलित के साथ खाना खा के उनपर एहसान कर रहे हैं/ उन पर उपकार कर रहे हैं/ बहरहाल हिन्दुओं ही नहीं तमाम दूसरे धर्म वालों के सामने भी कमोबेश यह जाति प्रथा की समस्या है/ मगर हमारे हिन्दू धर्म में यह कुछ ज़्यादा ही भयावह है/

सवाल ये है क्या एक जातिविहीन समाज का सपना साकार करना सम्भव है? क्या जाति हमारे सामाजिक परिवेश में एक निल फ़ैक्टर बनाई जा सकती है?

8 टिप्पणियाँ

  1. धुरविरोधी said,

    जाति विहीन समाज का सपना साकार करना एकदम संभव है.
    आप किसी और जाति धर्म की लड़की या लड़के से शादी कर लीजिये. अधिक जानकारी चाहिये तो रेडियोवाणी वाले यूनुस जी से मिलिये.

    और आपकी पीढ़ी ने जो किया वो किया, आने वाली पीढ़ी कम से कम आप की पीढ़ी जितनी तंगदिल नहीं होगी. समाज में जाति-धर्म गौण हो जायेंगे.

    विश्वास रखिये, एसा होगा, होगा और जरूर होगा

  2. bhaskar said,

    धुर विरोधी जी, भगवान करे आपकी बात सही साबित हो जल्दी से जल्दी (शादी वाली नहीं बल्कि जाति विहीन समाज वाली) इसमें कोई आपत्ति नहीं कि जिनको जाति का पुछल्ला चिपका के रखना है वे रखें उनकी मर्ज़ी है मगर जाति को किसी प्रकार के discrimination का आधार न बनाया जाए बस इतनी सी बात है/
    हालाँकि ये थोड़ा देखने वाली बात है कि ये स्वप्न कब तक पूरा होता है क्योंकि नयन में सपने भले हों पैर पृथ्वी पर खड़े हों” अपन अपने गाँव- खेड़े में जो देख रहे है उससे अभी जाति के महत्व के बढ़ने का ही आभास होता है हो सकता राजनीतिक वोट-बैंक का खेल हो मगर लगता तो यही है कि जिस जाति की संख्या जितनी ज़्यादा है उसे उतना ही महत्व मिल रहा है इसके चलते जातिव्यवस्था अप्रत्यक्ष रूप से पुष्ट ही हो रही है/

  3. अभय तिवारी said,

    बढ़िया लिखा भाई..

  4. अभय तिवारी said,

    लेकिन मुझे लगता है कि आपका सपना अभी निकट भविष्य में पूरा नहीं होने वाला .. मैं भी चाहता हूँ कि समता मूलक समाज बने.. पर मित्र ये भेद इतनी आसानी से मिट जायेंगे.. ये सोचना थोड़ा बचकाना होगा.. हाँ इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि अभी हम ऐसे समय में है जब ऐसा समाज बनाना एक सम्भावना है.. दूसरी भौतिक परिस्थितियां अनुकूल है.. तभी आज ये बाते हो सकती है.. आदमी के मन की दुनिया विचित्र होती है.. कभी तो प्रतिकूल समाज में भी एक बुद्ध जन्म ले लेता है.. और कभी सभी असमानताए मिट जाने पर भी मन में दुराग्रह पड़ा रह जाता है..

  5. bhaskar said,

    बिल्कुल अभय जी.. मेरा भी मानना यही है कि ये भेद मिट जाएंगे ऐसा मानना सिर्फ़ खुद को खामख्याली में डालने के माफ़िक होगा/ अभी ४ दिन पहले हमारे गाँव के पास वाले गाँव में दलितों को दबंगों ने एक महिला का अन्तिम संस्कार नहीं करने दिया/ प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद स्थिति सम्हली/ तो अभी एक मुद्दा तो मानसिकता का है/ दूसरा अपने बुद्धिजीवी लोग समस्या सुलझाने में कम उसके दाँए-बाँए पक्ष में ज्यादा रुचि लेते हैं/ परसाईं जी ऐसे में याद आते हैं जो लिख गये हैं -“यदि आप बुद्धिजीवी से भूख से मर रहे लोगों के बारे में चर्चा करेंगे तो वो आपको वर्ल्ड बैंक के खाद्य उत्पादन के आँकड़े बताने लगेगा/” खैर बुद्धिजीवी भाई लोग नाराज़ न होना/

  6. अतुल शर्मा said,

    आज की तुलना 50 साल पहले के समाज से करें, आप पाएँगे कि आज का समाज उस समय से अधिक खुला और बेहतर है। परिवर्तन भले ही धीमा हो परंतु हो रहा है।

  7. धुरविरोधी said,

    “अभी ४ दिन पहले हमारे गाँव के पास वाले गाँव में दलितों को दबंगों ने एक महिला का
    अन्तिम संस्कार नहीं करने दिया”
    लेकिन कौन जीता, दबंग या दलित? उस महिला का अंतिम संस्कार हुआ और दबंगों की छाती पर हुआ.
    भास्कर जी और अभय जी; मैं तो पूरी ताकत से विश्वास करता हूं कि एसा होगा. कौन सोचता था कि मायावती मुख्यमंत्री बनेंगीं और ब्राह्मण उनके पैर छुयेंगे ?
    आज जो बहुत कुछ हो रहा है वो कल तक हमारी पिछली पीढ़ी सोच तक नहीं सकती थी.
    शहरों में तो काफी परिवर्तन आ चुका है. गांव खेड़े भी कितने दिन अछूते रहेंगे ?
    केवल एक-डेड़ दशक और इन्तजार करते हैं. और परिवर्तन सुनामी की तरह नहीं दबे पांव आयेगा.

  8. bhaskar said,

    “Thus ends the world not with a bang but with a whimper” सही है भाई धुर-विरोधी जी आपकी बात. इसमें यह और जोड़ूँगा कि एक व्यवस्था को समाप्त करके दूसरे लोगों को वैसी ही व्यवस्था का ध्वजवाहक बनाना हमारा उद्देश्य कतई न हो/ चेहरों के बदलने वाली बात तो नहीं है बल्कि चरित्र बदलने की लड़ाई और लालसा है/ इस बारे में मैं फ़िर याद दिलाना चाहता हूँ कि हम जाति-विहीन समाज चाहते हैं न कि किसी जाति-विशेष के उच्चता और निम्नता का आभास कराने वाली व्यव्स्था/ हो सकता है मायावती का आना एक अपरिहार्य संक्रमण हो इस दिशा में मगर सिर्फ़ ब्राह्मणों के उनके पैर छू लेने से जातिवाद और जातिव्यव्स्था खत्म हो जाएगी ऐसा नहीं माना जाना चाहिए/ कल तक ब्राह्मण पैर छुआते थे आज कोई और …इससे फ़र्क़ क्या आया? हमारी कोशिश तो इसमें फ़र्क लाने की है न! यह बहुत कुछ सामन्तवाद सरीखा है / सामन्तवाद मिटा, हटा मगर आज भी हम क्या कह सकते हैं कि सामन्तवाद नहीं है/ यह है मगर दूसरे रूप में अपनी सन्तानों को राजनीतिक उत्तराधिकारी के बतौर पेश करने में ..वगेरह वगेरह..यह अपने आप में पूरे लेख का विषय है/ तो अपनी लड़ाई कुछ और है/ दलितों को सम्मान उस लड़ाई में एक कड़ी भर है/
    अतुल जी -आपका कहना सही है कि परिवर्तन हो रहा है हो सकता है धीमी गति से हो रहा हो/ हाँ बस इस परिवर्तन की दिशा ठीक ठीक बनी रहे यह ज़रूरी है/

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