दलितों में महादलित

अप्रैल 29, 2007 at 9:39 पूर्वाह्न (राजनीति के अखाड़े से)

जब जब सामाजिक प्रयोग करने की बात आती है समाजवादी नेताओं के नाम ख्याल में आते है/ कभी कभी भाजपाई भी याद आते हैं जिन्होंने और बड़े पैमाने पर सामाजिक प्रयोग किये हैं/ मगर दोनों की प्रयोगशालाएं अलग अलग हैं

शुरू में सबका साझा था क्योंकि बड़े सेठ लोग अपनी दुकान लोकतन्त्र के मार्केट में चलाना तो दूर लगाने ही नहीं दे रहे थे/ एक प्रयोग सन १९६७ में हुआ था संविद सरकारें बना कर (संयुक्त विधायक दल) फ़िर तमाम सारे प्रयोग दोनों दलों के वैज्ञानिकों ने किये/ बाद में नित नए प्रयोगों के चलते एक दूसरे की प्रयोगशालाओं में कोई रेडिएशन न फ़ैल जाए (या फ़ार्मूला कोई दूसरा न चुरा ले) इस वजह से दोनों पक्षों के वैज्ञानिकों ने आपस में मिल बैठ के तय किया कि अपन प्रयोगशालाएं अलग अलग कर लेते हैं हमारे तरफ़ के प्रयोगशाला से जो प्रोक्ट निकलेगा उसपे तुम नज़र मत दालना और ऐसा ही हम तुम्हारे लिये करेंगे/ 

बहरहाल भाजपाइयों की प्रयोगशाला बनी गुजरात और समाजवादियों ने उ.प्र. और बिहार में धमाचौकड़ी का कार्यक्रम शुरू किया/ बीच में यू.पी. में भी कुछ टाइम तक भाजपाइयों ने कोशिश कि मगर ज्यादा सफ़लता हाथ आई नहीं/ बाद में तय यह हुआ कि अपन रासायनिक तत्वों में हिस्सा बाँट कर लेते हैं जातिगत समीकरणों पर समाजवादी वैज्ञानिक काम करेंगे और धार्मिक तत्व वाले फ़ार्मूला पर भाजपाई/

इस बाँट बखेड़े में बेचारी कांग्रेस रह गई// उसके साथ समस्या यही है कि या तो उसके नेता दिवंगत हो चुके हैं या फ़िर अभी दूधपीते बच्चे हैं

जिस तरह से केमिकल लैब्स में एक तत्व को दूसरे से मिलाके अलग अलग कोम्बिनेशन बना के कुछ खोज परख की जाती है वैसे ही इन राजनीतिक प्रयोगशालाओ मे चलता है/

लालू जी ने माई (MY) समीकरण से खूब दिन सत्ता सुन्दरी का मन मोहे रखा तभी एक न्जिनीअर साब के हाथ कोई सिद्ध फ़ार्मूला लगा और उससे उन्होंने सत्ता की चाबी बना ली /

फ़िर कुछ दिन बाद एक नए रासायनिक तत्व की खोज हुई. बताया गया कि ये तत्व पृथ्वी पर मौज़ूद तो काफ़ी पहले से था मगर इसकी खोज अभी हुई है सो इस पर हमारा अधिकार बनता है इस तत्व का नाम है “अति पिछड़ा”/ इस अति पिछड़े की बात उठाई गई ताकि अगर कोई नई राजनीतिक दवा ईज़ाद हो तो उसका सबसे पहला उपयोग ये ययाति लोग करें/

अभी मुहल्ले में एक नई बहस है महादलित …मै तो सोचता था कि जार्गन्स (शब्द जाल) का निर्माण सिर्फ़ एन जी ओ वाले या कॊफ़ीरूम बुद्धिजीवी करते हैं मगर राजनेता भी इस मामले में आगे हैं.

हुआ कुछ यूँ कि दलितों में जो अति दलित हैं उनकी पहचान के लिए एक आयोग बनेगा.. प्रदेश का अन्दाज़ा तो लग ही गया होगा आपको/ नहीं लगा? धत्तेरे की इतना बड़ा विस्तार प्रसंग लिखने का क्या फ़ायदा? बिहार के अलावा यह योग्यता कहाँ के वैज्ञानिकों में है/ बिहार में यह बनेगा… अब महादलित आयोग बनेगा इसकी रिपोर्ट आनेपर बिहार में जादू की छड़ी घूमने वाली है..जिस के घूमते ही दलितों की सारी समस्याएं छूमन्तर हो जाएंगी…..उस छड़ी को बनाने के लिए कॉन्ट्रेक्ट किसको दिया जाए इसपे मोदी जी और नितीश जी के बीच सहमति नहीं बन पाइ है/

इसके बाद एक फ़ायदा ये भी हो सकता है कि महादलित नामका नया मिश्रण किसी बुढ़ातेराजनेता के लिए संजीवनी साबित हो जाए या फ़िर उसकी पूरी पार्टी वाले उस पर मौज करें/ हालँकि अन्तिम रिपोर्ट आने तक इस बारे में कुछ नही कहा जा सकता/

दलितों के नाम पर राजनेताओं की पूरी की पूरी पीढ़ियाँ मौज कर के चल दीं  और दलित आज भी ओख से पानी पीता है और घोड़ी पर चढ़े तो जूते खाने का भागी बनता है/ चलो देखते हैं ये महादलित में बाँटने की लीला भी देखते हैं/

 

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