जय काली कलकत्ते वाली

April 15, 2007 at 5:14 pm (विवक्षा)

अभी कल ही लौटा हूं कलकत्ता या यूं कहूं कोलकाता से. कलकत्ता जाने का उद्देश्य था मोबाइल बैंकिंग की एक कार्यशाला में भाग लेना/ कोलकाता शहर है सुभाष बाबू, देशबन्धु चितरन्जन दास, कवीन्द्र रवीन्द्र और बाघा जतीन का/

ये ही शहर था जिसे अन्ग्रेज़ी हुकूमत की राजधानी बनने का सौभग्य या दुर्भाग्य सबसे पहले मिला/ उस दौर में बंगाल का आर्थिक शोषण सबसे ज़्यादा हुआ और दुनिया के सबसे सम्पन्न और उर्वर इलाकों में से एक इलाका दारिद्रय के दलदल में फ़ंस गया/ आज़ादी के बाद कोलकाता ने डॊ. विधानचन्द्र राय के विधान से लेकर बुद्धदेव की बुद्धि तक सबको परखा और अनुभव किया/ सन १९४७ से १९७७ तक कांग्रेस का शासन रहा पश्चिम बंगाल में और फ़िर १९७७ में उदय हुआ भद्रलोक के ज्योति बाबू का जिन्होने भारत के सर्वाधिक काल तक मुख्यमन्त्री बने रहने का रिकार्ड कायम किया/ यह शायद हिन्दुस्तान ही नहीं तमाम दुनिया में अपने आप में रिकार्ड है/

वामपन्थी शासन शुरू हुआ था समाज में बढ़ते हुये नक्सल प्रभाव और उसके साथ जुड़ी हुई सामाजिक भावनाओं के राजनीतिक घोषणा के रूप में/ नक्सल आन्दोलन १९६७ के आस-पास नक्सलबाड़ी नामक स्थान से शुरू हुआ और चूंकि उन्होनें जिन मुद्दों को उठाया और समाधान की मांग की वे न सिर्फ़ सामयिक और क्रिटिकल थे बल्कि जन-मानस को उद्वेलित करने और अपने लिये तमाम वर्गों में समर्थन हासिल करने में भी सफ़ल रहे/ राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश और विरोध जताने के लिये इस वर्ग ने अपना एक अलग रास्ता अख्तियार किया/ और बहुधा ऐसा हुआ कि क्रियान्वयन के तरीकों पर तो विभिन्न समुदाय और वर्गों से विरोध के और असहमति के स्वर उभरते रहे परन्तु उन मुद्दों और वाज़िब चिन्ताओं से कोई असहमति नहीं जता सका/ बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग भी उन मुद्दों और कुछ हद तक क्रियान्वयन के तरीकों का हिमायती था/ बहरहाल वामपन्थी शासन आया और इसे हिन्दुस्तान में सर्वहारा के विजय की दिशा में मील का पत्थर माना गया/

इस बारें में निःसन्देह मानना होगा कि भूमि सुधारों की दिशा में बंगाल की सरकार ने सही दिशा में काम किया और उसे एक परिणिति तक पहुंचाया/ इसके अतिरिक्त और भी कुछ बड़े कार्य सामाजिक समानता बढ़ाने और आर्थिक विषमता हटाने के लिये हुए/ लेकिन इस दिशा में चलते हुए ज्योति बसु की सरकार ने बंगाल को वामपंथ की प्रयोगशाला बना दिया/ औद्योगिक विकास को इस राज्य में बुर्जुआ प्रतीक माना गया और हाथ रिक्शा चलाना सर्वहारा के हितैषी होने का/ लुब्बोलुआब ये कि राज्य का औद्योगिक विकास ठप्प पड़ गया और उस पर कोढ़ में खाज ये कि निरन्तर बढ़्ते हुए पड़ोसी देश से आव्रजन को रोकने के लिये सरकार ने कुछ कदम उठाए नही जिसके चलते पहले से ही सीमित अवसरों और संसाधनों पर अत्यधिक अतिरिक्त भार पड़ने लगा/

तो खैर मुद्दे पर वापिस आते है/ मैं सोचता हूं कि कोलकाता सिर्फ़ मां काली के कालीघाट का या रामकृष्ण परमहन्स के दक्षिणेश्वर का शहर नहीं बल्कि ये शहर है रेंगते हुये ट्रैफ़िक और फ़ुटपाथों पर घिसटती हुई ज़िन्दगियों का भी/ इतने बड़े शहर में जहां भी आप गुज़रें आपको फ़ुटपाथ पर बने हुए दड़बे मिल जायेंगे/ यदि बिना भवुक हुए सोचें तो भी ये शर्म की बात है कि वामपन्थ का नारा देने वाली और लेनिन-मार्क्स का नाम जपने वाली सरकारें अपने नागरिकों को एक साफ़-सुथरा शहर भी नहीं दे सकीं, हर आदमी के लिये रोटी-कपड़ा और मकान तो दूर की कौड़ी है/

दुष्यन्त शायद ऐसे स्थिति के लिये काफ़ी पहले फ़रमा गये –

“कहां तो तय था चिरागां हर एक घर् के लिये,कहां चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये”

खैर राज्य चर्चा के उपरान्त यात्रा वृतान्त ये है कि हम गये कालीघाट- मां काली का स्थान जिसके नाम पर कोलकाता का नामकरण हुआ/ इस मन्दिर पर पहुंचते ही पण्डा वृन्द हम पर झपट पड़ा मगर इस प्रकार की घटनाओं से दो-चार हो चुके होने के कारण हमको पता था कि इस झपट्टा झुण्ड से कैसे निपटना है.

कालीघाट काफ़ी प्रसिद्ध और प्राचीन मन्दिर है और कोलकाता आने वाला प्रायः प्रत्येक धार्मिक श्रद्धालु यहां आता है/ भारत में कुछ गिने-चुने मुख्यधारा के मन्दिर बचे है जहां पशुबलि की अन्धपरम्परा और मूढ़ मान्यता अभी भी जारी है/ कालीघाट के देवस्थान में भी ऐसा ही है/ मन्दिर के ठीक सामने पशुबलि के खंभ अवस्थित हैं और वहीं बलि दी जाती है/ बलि की यह परम्परा अभी तक कैसे चल रही है इसके अपने कारण हैं जिन पर विस्तार से चर्चा फ़िर कभी/

तो मन्दिर में पहुंचने के पहले जूते उतारने के लिये हमने कोई जूता स्टैंड नुमा कुछ खोजने का प्रयास किया और मैं यह जान के चकित रह गया कि इतने बड़े मन्दिर जहां हज़ारों श्रद्धालु नित्यप्रति पूजन-आराधन के लिये आते है वहां जूता स्टैंड की कोई व्यवस्था ही नहीं है. सब खुला दरबार है जूते उतारने के लिए आपको किसी भी दुकानदार से कुछ पुष्प-पत्र लेना पड़ेगा/ मैं संघर्ष के मूड में नहीं था और फ़िर मुझे नन्दीग्राम के बारे में पता भी था तो व्यवस्था में ही समझौता कर लिया/

मन्दिर की तरफ़ बढ़ने की दिशा में तमाम सारे दुकानें बनी हुई हैं जो मिल जुल कर मन्दिर का प्रवेश पथ संकरी गली जैसा बना देती हैं/ और उस संकरी गली में भारी कीचड़ और गन्दगी थी जो कि ऐसा आभास करा रही थी कि जैसे मन्दिर को बरसों से धोया नहीं गया हो/ प्रवेश के बाद मन्दिर का प्रांगण और भी गन्दा था कुछ श्रद्धालु गण मन्दिर के मण्डप में बैठे हुए मां काली का आराधन कर रहे थे/

ऐसी विराट आस्था के केन्द्र इस स्थान पर मन्दिर के दर्शनार्थियों के लिये न तो उचित रूप से पंक्तिबद्ध होने की व्यवस्था थी न ही उन्हें तीखी धूप से बचाव के लिये कोई शेड की व्यवस्था/ हमने भीड़ से हट्कर लाइन में लगे और कोशिश की अपनी आस्था श्रद्धा साबुत रख सकें, मगर भीड़ और कोल्कता की उमस भरी गर्मी में हमारी हिम्मत नहीं पड़ी कि वहां खड़े रह कर २-३ घन्टे इन्तज़ार कर सकें/

मुझे नहीं पता था कि भगवान वास्तव में इतनी कठिनाई से मिलते है/मन्दिर का प्रांगण छोटा है और उस पर भी अव्यवस्थित है. (उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है और उसमें तकरीबन १०००० लोगों के एक समय में मन्दिर में खड़े होने की क्षमता है वह भी पूरे आराम के साथ)/

जब मैं उस भीड़ में खड़ा हुआ था तो सोच रहा था कि धर्म को अफ़ीम की गोली समझने वाले विचारकों और उसके कार्यान्वयकों ने धार्मिक स्थलों की आत्यन्तिक उपेक्षा करके अपने नागरिकों को कष्ट दिया या वामपन्थ की दिशा में मील का पत्थर तय किया/ खैर वहां से दर्शन लाभ तो हो नहीं सका, हम उसके लिये गये भी नहीं थे/ गये थे प्रख्याति और प्राचीनता के दर्शन के लिये/

इसके बाद प्लान हुआ कि दक्षिणेश्वर चला जाए/दक्षिणेश्वर है कोलकाता के उत्तर दिशा में/ यह मन्दिर रानी रासमणि देवी ने बनवाया था और इसी मन्दिर के पुजारी थे स्वामी रामकृष्ण परमहंस/ मां काली के परम भक्त और साधक/ हुगली के तट पर बना है ये मन्दिर/ विशालता और सौन्दर्य में यह मन्दिर अद्भुत लगा/ मन्दिर का स्थापत्य टिपिकल बांग्ला शैली का है/ ईंटों की चिनाई वाली लदाऊ छतें और छ्त को घेरते हुये आगे की तरफ़ झुके कुछ चौरस से गुम्बद/

मैं सोचता हूं कि स्थापत्य की इतनी शैलियां और इतना वैविध्य कहां से आता होगा निर्माणकर्ताओं के दिमाग में/  हिन्दुस्तान में जिस इलाके में जाइए आपको अलग प्रकार का निर्माण कला और स्थापत्य मिलेगा, जो कि नितान्त मौलिक विशिष्टताओं के साथ अपने अलग अस्तित्व का बोध करवाता हुआ प्रतीत होगा/ मुख्य मन्दिर देवी काली का है और उसके सामने ही बहती है खूब चौड़े पाट की हुगली/ इतनी लम्बी चौड़ी नदी देखना हम मध्यप्रदेश के लोगों के लिए तो प्राकृतिक सौन्दर्य का कारक हो ही सकती है/ कुल मिला के नैसर्गिक सुषमा का दृश्य अभी तक मेरी निगाहों के सामने है/ आशंका के विपरीत हुगली इतनी गन्दी नहीं है जितनी कि गंगा कानपुर या अन्य किसी औद्योगिक शहर में है/ तट पर खड़े हुए ताड़ के गाछ और किनारे लगी हुई नावें एक ओर से दूसरे ओर अनवरत रूप से यात्रियों को पहुंचाती रहती हैं लगा कुछ ऐसा कि मानो सत्तर के दशक की हृषिकेष दा की फ़िल्म का कोई सीन है/

यहां से बेलूर मठ के लिए नाव पर जाना होता है/ बेलूर मठ है स्वामी रामकृष्ण परमहंस और उनकी लीलासंगिनी मां शारदा का स्थान/ यह स्थान स्वामी विवेकानंद से जुड़ा हुआ है/ रामकृष्ण मिशन इसका संचालन और देखभाल करता है/ और इसी की वजह से यह मठ और इसके आस-पास का वातावरण सुरम्य, स्वच्छ और सुन्दर है/ नाव से उतर कर मठ में जब पहुंचे तो हम लोग लेट हो गये थे/ मठ का समय १२ बजे दोपहर तक ही रहता है और हम साढ़े १२ बजे पहुंचे थे, तो ज्यादा कुछ घूमने का समय नहीं मिल सका/ मुझे जल्दी ही लौट के आना था क्योंकि लखनऊ आने वाली उड़ान में सिर्फ़ ३ घंटे शेष थे/ तो ये था कोलकाता प्रवास का इतिवृत्त यानि कि चिट्ठा/

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गायकी का अलग अन्दाज़- शोभा गुर्टू

April 14, 2007 at 6:12 pm (कुछ इधर की कुछ उधर की)

आर्कुट नाम की चीज़ से जो मुझे सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ वो ये कि तमाम सारा शास्त्रीय संगीत उपलब्ध हुआ सुनने के लिये/कुछ दिन पहले श्रीमती शोभा गुर्टू जी की कुछ ठुमरियां डाउनलोड की/ शोभा जी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की महान गायिकाओं में से रही हैं उनकी मां मेनकाबाई शिरोड़्कर भी बड़ी गायिका थीं/ शोभा जी ने मुख्यतः उपशास्त्रीय गाया है यानि कि दादरा ठुमरी, चैती और कजरी मगर उपशास्त्रीय के लिये भी तालीम और रियाज़ में कोई छूट की गुन्जाइश है नहीं/शोभा जी लगभग २ वर्ष पूर्व दिवंगत हो गईं ७८ साल की उम्र में, मगर उनका संगीत विचक्षण है हालांकि उनके संगीत की तकनीकी बारीकियां तो सुर-ताल के महारथी ही जानें मगर अपने को सुनने में जो अच्छा लगे वही बढ़िया लगता है/ उन्हें ठुमरी की साम्राज्ञी की उपाधि दी गई हालांकि उनसे पहले भी कई गायिकाओं ने उपशास्त्रीय गाया है और समकालीन में भी गा रही हैं, मगर वह बुलन्द आवाज़ और खुले गले की गायकी शोभा जी की विशेषता है/ जिन मित्रों का शास्त्रीय संगीत से थोड़ा दूर का नाता है उनके लिये बता दूं कि फ़िल्म “मैं तुलसी तेरे आंगन की” में “सैयां रूठ गये”  और “प्रहार” में “याद पिया की आये” ठुमरियां शोभा जी ने ही गाई है/ कभी मौका मिले तो ज़रूर सुनें एक अलग मज़ा आयेगा.शास्त्रीय संगीत की तकनीकी बारीकियों से अनभिज्ञ हमारे जैसे लोग भी आनन्द उठा सकते हैं इसका/ उस्ताद विलायत खान साहब फ़रमा गये हैं कि “ठुमरी गाने के लिये तो अल्लाह मियां एक दिल देवें तभी सुनने में मज़ा आता है” तो ठुमरी है भाव की गायकी/ भाव जितना ज़्यादा सही तरीके से और जिस तीव्रता से श्रोता तक पहुंचता है वही गायकी की सफ़लता मानी जाती है/ इस विषय पर थोड़ी गप-शप और मन्थन फ़िर कभी/

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पुनरागमन

April 14, 2007 at 6:03 pm (Uncategorized)

प्रिय मित्रोयह ब्लोग पहले चल रहा था blogspot पर मगर तमाम सारी वजहों से यह स्थायी नही रह सका, जिसमें सबसे बड़ी वजह थी हमारा आलस बहरहाल blogspot ने आखिरकार हमारी ब्लोग से हमारा ही अधिकार छीन लिया तो सोचा कि दूसरे मोहल्ले में दुकान लगाई जाये/ बहुत बार दोस्तों ने पूछा है कि सम्बदिया का मतलब क्या है? इसके मायने क्या है? तो उन आदरणीय पाठकों की जानकारी हेतु बता दूं कि सम्बदिया का मतलब होता है एलची, खबरची, दूत, सम्वाद वाहक/ महान कथाकार फ़णीश्वर नाथ “रेणु” की एक प्रख्यात कहानी का नाम भी है/ सम्वदिया दोबारा शुरू करने की ललक काफ़ी दिनो से मन में थी मगर बस आलस्य और दीर्घसूत्रता के कारण काम हो ही नहीं पा रहा था.. उस पर मज़ा ये कि लिखने का सरन्जाम तमाम गायब..बहरहाल कुल जमा बात ये कि लिखने का क्रम इसमें टूट गया.इस बार कोशिश रहेगी कि अपनी कवितायें झिलाने के अलावा कुछ और भी लिख सकूं/रोज़ सुबह का अखबार कुछ न कुछ नया दे डालता है विचार-मन्थन को/ अपने यहां मुद्दों की कमी है क्या? एक छॊड़ हज़ार मिलते हैं/

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