दो स्वरों के बीच होता है मौन
होती है निस्तब्धता
और होता है निस्पंद
स्वरों की गूंज में सुनाई नहीं देता वह मौन
जो अलगाता भी इन्हें
और बनाता भी है एकाकार
क्या वही होता है फर्क जो दिखाई देता है
या कहीं और कुछ आंच पे चढ़ा,
अदन सा उबलता रहता है बिना उफनाए
गान में कोई राग हो न हो, मेलोडी का अभाव हो तो भी
विद्यती है सत्ता उस स्वर की,
जो उपजा था मौन के व्यतिक्रम से
सागर की लहर और श्लाघ्य गाम्भीर्य में कही जोड़ है भीतर
जिसे भिन्न किया मरुत की गति ने
शीर्ण जरायु होते व्योम पर ज्यो नीलाभ लालिमा छाए
वैसे ही उपरिआरोपित होते है स्वर, मौन के
16-05-2010