बस एक खबर का सवाल है….

August 12, 2008 at 3:54 pm (विवक्षा)

शुरू करते हैं एक खबर से .. वैसे तो ये रोज़ का ड्रामा है मगर आज बड़ा इरिटेटिंग हो गया. कल ज़ी न्यूज़ के सज्जनों ने पूरा शाम हंगामा काटा इस बात पर कि अभिनव बिन्द्रा को स्टेडियम से बाहर जाने के लिये कथित रूप से कार नहीं मिली, ये देश का अपमान है वगैरह वगैरह (हालाँकि ये खुद मूर्खतापूर्ण खबरें दिखा के जनता का अपमान करते हैं मगर उसे छोड़िये).
इस खबर का पिष्ट पेषण करते हुये उबाऊ तरीके से इस खबर को ज़ी न्यूज़ वाले दिखाते रहे / कुछ देर बाद इंडियन शूटिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह से उन्होंने बात की. बेचारे दिग्विजय बाबू पूरा ज़ोर लगा के इस सब घटना को एक सामान्य घटना बताते रहे. (हालाँकि राजनेताओं की बात पे भरोसा करना कोई अकलमन्दी की बात नहीं है ऐसा बुज़ुर्ग कह गये हैं मगर मीडिया का भी कोई भरोसा नहीं है पता नहीम कब किस को उमा खुराना बना दें)
मगर सम्भवतः समाचार वाचिका ने बात करने के लिये नहीं सिर्फ़ झगड़्ने के लिए बुलाया था. इसी क्रम में दिग्विजय बाबू से कहा गया कि आप इस सम्वाददाता से सीधे बात कर लें. इस सब में मज़ेदार ये रहा कि जैसे ही उस सम्वाददाता ने माना कि “नही, गलत तो कुछ नहीं था” वैसे ही कनेक्शन काट दिया गया और फ़िर वही राग “मान-अपमान” की आलाप लगाने लगे. वैसे भी आजकल समाचार बनाये जाते हैं न कि एकत्र किये जाते हैं. यह सब एक भयानक रिक्ति प्रदर्शित करता है और कुछ नहीं. ऐसा माना जाता है कि मीडिया में कायदे के और बौद्धिक रूप से परिपक्व लोग एकत्र होते हैं मगर फ़िलहाल ऐसा लगता है कि तमाम सारे नाकारा और मूर्ख लोग वहाँ से अपने मठों का सन्चालन कर रहे हैं. एकाध चैनल को छोड़ दिया जए तो सब के सब शनि देवता और भूत वाली बावड़ी को राष्ट्रीय समस्या मान के उसे कवर करने में लगे रहते हैं.
बिन्द्रा की जीत के बाद बेहतर होता कि खेलों में सुधार की नयी सम्भावनाओं के बारे में चर्चा होती, मगर ये लोग यही पूछ्ते रहे कि “अभिनव को खाने में क्या पसन्द है? वो रोटी ज़्यादा खाता है या चावल?”
जब जम्मू जल रहा हो तब ये लोग व्यस्त रहते हैं सलमान शाहरुख की लड़ाई को दिखाने में. यह सब एक नया सामन्तवाद है जिसमें कुछ लोगों पर इतना ज़्यादा तवज्जो दिया जाता है कि बाकी सब अस्तित्वविहीन हो जाते हैं.
हमारा सम्विधान कहता है कि एक प्रमुख उद्देश्य होगा “नागरिकों में वैज्ञानिक चेतना और सोच का प्रसार”. सवाल यह है कि हफ़्ते में सात दिन तान्त्रिक साधना और ग्रह शान्ति के कार्यक्रम दिखा के, किसी सीधी सादी घटना को भी रहस्य राज़ साजिश के त्रिकोण में दिखा के क्या ये चैनल्स सम्विधान का उल्लंघन नहीं करते? इन्होंने एक अजीब किस्म का नशा मुल्क़ पर तारी कर रखा है.
एक अजीब किस्म का नशा बस खाओ पिओ और खोये रहो..सास बहू की काल्पनिक लड़ाइयों में, ज्योतिषाचार्यों के सुबह सुबह वाले भविष्यफ़लों में और क्रिकेट के नशे में और बाकी समय उसकी खुमारी में.
प्रायः कहा जाता है कि मीडिया तो समाज का दर्पण है जैसा हो रहा है वैसा दिखाया जाएगा. वही लोगों को पसन्द है. अगर इस बात पर यक़ीन करें तो यह मानने के अलावा कोई चारा नहीं कि हम बौद्धिक और भावनात्मक रूप से दिवालियेपन के कगार पे खड़े हैं. अभी मीडिया सिर्फ़ आइना दिखाने से बहुत आगे बढ़ गया है. इसे अपनी मूर्खतापूर्ण हरकतों से बाज़ आना चाहिये. क्या हिन्दी चैनल देखने वालों के ये सब ….उल्लू (मैं दूसरा शब्द लिखना चाह रहा था लोग समझ गये होंगे!) समझते हैं?

3 Comments

  1. nitish raj said,

    बिल्कुल सही लिखा है और दूसरा शब्द भी समझ गए।
    अब मीडिया कोई दर्पण नहीं रह गया उसका दर्प तो अब हर जगह दिखता है।
    http://nitishraj30.blogspot.com/2008/08/blog-post_09.html चाहें तो इस भी पढ़ सकते
    हैं।

  2. sameerlal said,

    अच्छा किया उल्लू लिख दिया-दूसरा शब्द तो समझ ही गये हैं. :)

  3. Nitin Bagla said,

    भाई हम तो न्यूज चैनल मनोरंजन के लिये देखते हैं…खबरें तो इन्टरनेट पर मिल ही जाती हैं…

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