भाषा की विभीषिका
भाषा का इस्तेमाल किस तरह से अपने निजी और राजनैतिक उद्देस्यों की पूर्ति के लिये होता है यह कोई नयी या अपरिचित बात नहीं है/ सातवें दशक में त्रिभाषा फ़ार्मूला शिक्षा के क्षेत्र में लागू करने के समय भी ऐसा ही कुछ था/
ताजातरीन घटना झारखन्ड की है जहाँ एक नितान्त लँगड़ी अक्षम और व्यावहारिक तौर पर अस्तित्वविहीन सरकार ने उर्दू को द्वितीय भाषा घोषित कर दिया है/ ज्ञातव्य है कि इस प्रकार की माँग बंगाली, सन्थाली और अन्य बोलियों की तरफ़ से भी आ रही थी/ मगर इन सबको नज़र-अन्दाज़ करते हुए उर्दू को यह दर्ज़ा देने का फ़ैसला किया गया/
बतौर एक भाषा उर्दू से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती, मगर झारखण्ड में यह कितनी व्यावहारिक और अपरिहार्य है, यह विचारणीय बिन्दु है/ झारखण्ड एक जनजातीय बहुल राज्य है जिसमें कई लोकभाषाएं प्रचलित हैं, ये लोकभाषाएं जनजातीय समाज का इतिहास, वाचिक परम्परा और संस्कृति की अभिन्न सहचरियों की भूमिका निभाती चली आ रहीं हैं/ काफ़ी बड़ी संख्या में बंगाली प्रवासी भी इस राज्य में हैं जो बंगला को द्वितीय भाषा का स्तर देने का मज़बूत आधार और तर्क प्रस्तुत करते हैं/ इन सब तर्कों और भावनाओं को निरस्त करते हुए, राजनैतिक सौदेबाज़ी के तहत और चिरन्तन वोट बैंक पॉलिटिक्स के मँझे हुए खिलाड़ियों ने उर्दू को राजभाषा बना दिया/
विडम्बना यह है कि उर्दू भाषियों की संख्या राज्य में न केवल अल्प परिमाण में है बल्कि यह भाषा ऊपर से थोपे गये होने का भी आभास कराती है क्योंकि यह जनजातीय लोगों के जीवन पद्धति से जुड़ी हुई नहीं है/ विडम्बना यह भी है कि प्रदेश की मुख्यमन्त्री की गद्दी पर मधु कौड़ा विराजे हुए हैं, जो स्वयं जनजातीय वर्ग से सम्बद्ध हैं/ ज़्यादा तार्किक और बेहतर यह होता कि किसी लोकभाषा को यह दर्ज़ा दिया जाता जिससे आदिवासी और पारम्परिक समुदायों को मुख्य धारा में लाने की शासकीय वादों की भूतल स्तर पर परिणिति की दिशा में एक मजबूट कदम माना जाता/ (मुख्य धारा का मिथक भी विवादास्पद है क्योंकि मुख्य और गौण तय करने का अधिकार हमको किसने दिया?)
यह समझना बिल्कुल बुद्धि के परे है कि क्यों जनजातीय समुदायों की माँगों को नकारा जाता है और धार्मिक अल्पसंख्यकों की माँगों को बिना किसी हो हल्ले के चुपचाप मान लिया जाता है/
एक अद्भुत सरकार ऐसा ही कर सकती है क्योंकि उसे किसी भी समय चुनाव की रणभेरी सुनाई दे सकती है/ और ऐसे में राज्य के धर्म निरपेक्ष नेता गण अल्प्संख्यकों के विकास के बजाय भाषा और त्योहारों की छुट्टी के नाम पर वोट माँगने जा सकते हैं/
भाषा के साथ ऐसा खेल वे ही लोग खेल सकते हैं जिन्हें दिन के ३ बजे भी राजनीति सूझती है और रात के ३ बजे भी/