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	<title>Comments on: </title>
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	<description>संवाद-प्रवाह</description>
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		<title>By: राजीव रंजन प्रसाद</title>
		<link>http://samvadiya.wordpress.com/2007/06/11/28/#comment-37</link>
		<dc:creator>राजीव रंजन प्रसाद</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 11 Jun 2007 10:01:21 +0000</pubDate>
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		<description>भास्कर जी,
मौत सचमुच आजकल दबेपाँव नहीं आती। बहुत सुन्दर विश्लेषण है आपका। SEZ का कविता में प्रयोग अलग ही प्रकार का है, क्योंकि इसे अंग्रेजी में लिखे बिना भी बात नहीं बनती वरना अनर्थ की संभावनायें अधिक हैं :)। 

गंभीर् प्रश्न उठाये हैं आपनें:

उन सबके राज्यों में, जो कहते हैं खुद को चाहे राष्ट्रवादी या मज़दूरों के अलम्बरदार
हज़ारों हज़ार लोग ढो चले हैं अपने मकान अपने सिरों पर, छोड़ रहे हैं ज़मीनें अधजुती
ताकि विकास हो सके देश का/ कुछ और खरब पति कर सकें नाम रोशन/

हुक्काम अलमस्त फ़्रेन्च वाइन के लुत्फ़ में गुम/
झण्डे उठा के जो पीछे चले थे, उन्हीं के ड्ण्डे बरस रहे हैं/ 

शाम की खबर “मारे गए पुलिस के लोग नक्सलियों के हाथ झुण्ड के झूण्ड”
मार्क्स कितनी बन्दूकें छिपा गए तुम बस्तर के गिरिकाननों में?
यहाँ भी लोग मर रहे हैं/ नई भर्तियाँ नई मौत का नैवेद्य हैं/

कविता की सराहना करनी होगी कि अपनी पकड कहीं नहीं खोती। थोडा बस्तर के प्रश्न पर कहना अवश्य चाहूँगा कि कम्बख्त नक्सलियों नें वहाँ मसला विकास-विनाश का रहने ही नहीं दिया है। खालिस डाकुओं की चर्चा भी हम बस्तरियों का दर्द ही बढाती है( कुछ पत्रकारों को छोड कर)।

*** राजीव रंजन प्रसाद</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भास्कर जी,<br />
मौत सचमुच आजकल दबेपाँव नहीं आती। बहुत सुन्दर विश्लेषण है आपका। SEZ का कविता में प्रयोग अलग ही प्रकार का है, क्योंकि इसे अंग्रेजी में लिखे बिना भी बात नहीं बनती वरना अनर्थ की संभावनायें अधिक हैं <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> । </p>
<p>गंभीर् प्रश्न उठाये हैं आपनें:</p>
<p>उन सबके राज्यों में, जो कहते हैं खुद को चाहे राष्ट्रवादी या मज़दूरों के अलम्बरदार<br />
हज़ारों हज़ार लोग ढो चले हैं अपने मकान अपने सिरों पर, छोड़ रहे हैं ज़मीनें अधजुती<br />
ताकि विकास हो सके देश का/ कुछ और खरब पति कर सकें नाम रोशन/</p>
<p>हुक्काम अलमस्त फ़्रेन्च वाइन के लुत्फ़ में गुम/<br />
झण्डे उठा के जो पीछे चले थे, उन्हीं के ड्ण्डे बरस रहे हैं/ </p>
<p>शाम की खबर “मारे गए पुलिस के लोग नक्सलियों के हाथ झुण्ड के झूण्ड”<br />
मार्क्स कितनी बन्दूकें छिपा गए तुम बस्तर के गिरिकाननों में?<br />
यहाँ भी लोग मर रहे हैं/ नई भर्तियाँ नई मौत का नैवेद्य हैं/</p>
<p>कविता की सराहना करनी होगी कि अपनी पकड कहीं नहीं खोती। थोडा बस्तर के प्रश्न पर कहना अवश्य चाहूँगा कि कम्बख्त नक्सलियों नें वहाँ मसला विकास-विनाश का रहने ही नहीं दिया है। खालिस डाकुओं की चर्चा भी हम बस्तरियों का दर्द ही बढाती है( कुछ पत्रकारों को छोड कर)।</p>
<p>*** राजीव रंजन प्रसाद</p>
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