इसके आगे क्या?

June 3, 2007 at 8:37 pm (विवक्षा)

यह लेख लिखते वक्त मैं न सिर्फ़ शर्मसार हूँ बल्कि उससे भी ज्यादा दुखी हूँ/ आप भी राजस्थान में हो रही घटनाओं के सन्दर्भ में निश्चित रूप से दुखी और क्षुब्ध होंगे/ यह वाकई शर्म की बात है, दुख की बात है और सबसे ज़्यादा हद दर्ज़े के राजनैतिक हरामीपन (क्षमा कीजिए मैं और विनम्र नहीं हो सकता) की मिसाल है कि शान्ति का जज़ीरा राजस्थान आग में जल रहा है/ समाज की जड़ता, मूढ़ता और जातिअन्धता के साथ ही सरकार के नाकारापन और निकम्मेपन की मिसाल है यह अराजकता/ लगता है कि सरकार और प्रशासन है ही नहीं/ राजस्थान जल रहा है अराजकता की आग में और लगता है कानून व्यवस्था बहाल करने में सरकार की दिलचस्पी है ही नहीं/ या हालात सम्हाले नही सम्हल रहे/
आरक्षण का सामाजिक सशक्तिकरण का औज़ार कैसे धारदार और हिंसक हथियार में तब्दील हो रहा है यह राजस्थान में साफ़ नज़र आ रहा है/ सब जानते हैं आरक्षण की शुरुआत समाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितसाधन के लिये हुई थी बाद में यह खेल में नेताओं को कुछ ज़्यादा ही मज़ा आने लगा/ एक किस्म की सामाजिक रिश्वत एक जाति-विशेष को दो और बस ५ साल तक लूट-खसोट का लाइसेन्स प्राप्त कर लो/
सवाल ये भी है कि क्या ये सब स्वतःस्फ़ूर्त है या कोई और पर्दे के पीछे से कठपुतलियाँ नचा रहा है. क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर खिँचता हुआ संघर्ष, ये उन्मादी तेवर कुछ और ही इंगित करते हैं/
जातिगत संघर्ष न केवल अत्यन्त हिंसक और अराजक हो गया है बल्कि विद्रोह के स्तर तक पहुँच गया मालूम होता है/ यह सिर्फ़ अपने ही मुल्क में होता है कि हम गुस्सा उतारने ले लिये अपने ही बसें जला डालते है/ अपने ही साथी नागरिकों की सम्पत्ति पर हमला कर देते हैं/ अन्य नागरिकों को तकरीबन बन्धक सा बना लेते हैं और इस सबके बाद अपने ही शहर या राज्य को आग की लपटों में झोंक देते हैं/ मॉब मानसिकता का विचार-धर्म नहीं होता/ यह भीड़ गाड़रों के रेवड़ की तरह हाँकी जाती है/ समझदार आदमी का दिमाग भी काम करना बन्द कर देता है या फ़िर उसकी बात सुनी ही नहीं जाती/
राजनैतिक मोर्चे पर देखें तो शुरू के दिनों तक किसी ने गम्भीरता भाँपी ही नहीं/ फ़िर जब होश आया कि बाज़ी हाथ से निकल रही है तब प्रयास शुरू हुए बात-चीत के और समझौते के/
दौसा से सांसद सचिन पायलट साह्ब ने दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिह से मिलने के बाद बयान जारी किया कि “सारा हिन्दुस्तान का गुर्जर समाज राजस्थान के गुर्जरों की माँग का समर्थन करता है” मगर उन्होंने इस बेशर्म ताण्डव और उपद्रव को रोकने के लिये क्या किया?

इधर वसुन्धरा जी ३-४ दिन तो जनता से नाराज़ रहीं कोई बयान नहीं कोई बात नहीं…जाओ हम तुमसे बात नही करते/ हम महारानी हैं तुम प्रजा/ हमारी मर्ज़ी थी हमने कह दिया कि आरक्षण देंगे अब नहीं है मर्ज़ी/ सोनिया गाँधी के बयानों की खिल्ली उड़ाने वाली भाजपा की यह नेत्री बयान ऐसे देती हैं जैसे किताब पढ़ रही हों/ अगर आपको याद हो तो ये ही थी जो राजस्थान मे पानी की टंकी के ध्वस्त हो जाने से लोगों की मृत्यु की घटना पर हँस पड़ी थीं.. शायद अब वे ठहाके मार रही होंगी/
पहला सवाल ये है क्यों मुख्यमन्त्री ने यह वादा किया था कि गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल कर दिया जाएगा? सिर्फ़ टुच्चे राजनीतिक लाभॊं के लिये? इस माँग के बाद सरकारी नौकरियों में अपने हिस्से को लेकर खतरा लगा मीणा समाज को क्योंकि राजस्थाने में अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाली अधिकतर सुविधाएं इसी वर्ग तक सीमित हैं/
जातीय भेद हिन्दुस्तान मे हमेशा रहे हैं मगर इस दफ़ा यह अत्यन्त हिंसक, विध्वंसक और दीर्घकालिक प्रभावों वाला है. सवाल ये भी है कि क्या सिर्फ़ गुर्जर और मीणा समुदाय ही मुल्क में पिछड़े हैं? यहाँ सैकड़ों समुदाय हैं …विड्म्बना ये हो गयी है कि लोग अच्छे सुविधाओं और शिक्षा की माँग नही करते सिर्फ़ आरक्षण की माँग करते हैं/
आखिर कौन है वे लोग जो इस आक्रोश की आग को हवा दे रहे हैं ..ऐसे माहौल में जाति के स्वयम्भू नेताओं की चाँदी हो गई है/ सौदेबाज़ी के खेल में ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा पा सकें इसलिये दोनों जातियों के नेता नही चाह रहे कि ये आग बुझे/ या हो सकता है इसे बुझाना उनके बस में ही न हो/
एक कोई कर्नल साब हैं जो गुर्जरों के नेता बन के मुख्यमन्त्री से बात कर रहे हैं …याद रखिये सबसे ज़्यादा बदमाश नेता वॉलेटाइल माहौल में ही अपनी जगह बनाते हैं और खुद के लिये सबसे ज्यादा मलाई का हिस्सा सुरक्षित कर लेते हैं.
स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कैसे? क्यों गुर्जरों ने ताण्डव शुरू किया और कौन लोग थे जिन्होंने मीणा समुदाय को प्रतिक्रियात्मक हिंसा शुरू करने की सलाह दी?
सवाल ये भी है कि कौन हैं इस उन्मादित भीड़ के नेता? दोनों तरफ़ की इस भीड़ का नेतृत्व समझदारों के हाथ में तो नहीं ही है बल्कि जाति की संकुचित मानसिकता से ग्रस्त लोगों के हाथों में है जो लोग सिर्फ़ जाति के चश्मे से देख सकते हैं/ क्योंकि ये ही उनके हित में है/
यह उपद्रव हमारे सामने एक और प्रश्न रखता है/ क्या निरी गुण्डागिर्दी से माँगें मनवाई जाएंगी? आगजनी, तोड़फ़ोड़ और लूट-खसोट का माहौल/ यह सीधे सीधे गुण्डागिर्दी है. यह बिल्कुल फ़िरौती माँगने जैसा काम है
यह धार्मिक खाई से भी बड़ी एक खाई पैदा हो रही है समाज में.हिन्दुस्तान जातियों में अगर बँटा तो इसके ६४०० टुकड़े हो जाऎंगे..कोई अचरज वाली बात नहीं कल तक धर्म के नाम पर दंगे होते रहे अब उसमें एक नया डायमेन्शन जातीय दंगों का जुड़ जाएगा/ हिन्दुस्तान को जातियों में मत बाँटिये नहीं तो इसके टुकड़े खुर्दबीन से भी नज़र नहीं आएंगे/
सच में यह बहुत क्षोभ, दुःख और शर्म की बात है हम बात में नहीं लात में विश्वास करने लगे हैं/
कहाँ हैं वे महान सांसद और नेता गण जो जनता की नब्ज़ पकड़ने का दावा करते हैं क्यों नहीं समझाया जा रहा है दोनों पक्षों को…
अपनी रोटियाँ सेकने के लिये इस आग को हवा मत दीजिये ये आग घर जला कर राख कर देगी/
क्या कर लेगा कोई अगर कल कोई दूसरी जात इसी तरह के हिंसक आन्दो लन पर उतर आती है… भीड़ तर्कों से शान्त नहीं होती..उसकी मानसिकता अलग ही होती है/ यह ध्रुवीकरण अच्छे भले आदमी को जातिवादी दृष्टिकोण से सोचना सिखाया किन्होंने? इन्हीं पाखण्डी राजनीतिक नेताओं ने/
शर्म की बात ये है कि पर्यटक फ़ँसे हैं राजस्थान में जिनमें विदेशी पर्यटक भी हैं जो राजस्थान की संस्कृति को, इतिहास और कला को देखने, उसका आस्वादन करने आते हैं वे सब रास्तों में फ़ँस हुए हैं.  वैसे तो मुल्क की छवि की चिन्ता कोई करता नहीं है मगर ज़रा सोचिये फ़िर भी/ क्या छवि मुल्क की बनी? कुछ यूँ कि हिन्द्स्तान भी युगाण्डा और सोमालिया जैसा एक मुल्क है जहाँ कभी भी अराजकता फ़ैल सकती है, कभी भी कानून का राज खत्म हो सकता है और कभी भी गुण्डा तत्व प्रशासन ध्वस्त कर सकते हैं/
यह फ़साद हमारे सामने सवाल खड़े कर रहा है और चेतावनी भी दे रहा है/ आगे के लिये सचेत कर रहा है/

कल के दिन यदि ठाकुर या ब्राह्मण निकल पड़ें सड़कों पर और बिल्कुल इसी तरीके से विध्वन्स और उपद्रव पर उतारू हो जाएं तो क्या कर लेंगी हमारी सरकारें और प्रशासन/ क्या सरकारें, राज्य, प्रशासन और इस पूरे देश को  ऐसे बन्धक बनाने की अनुमति दी जा सकती है? 

डर ये नहीं कि मौत आ गई बल्कि ये है कि यमराज ने घर देख लिया/ कल अगर जाट कहते हैं कि हमको जनजाति में शामिल करो तो क्या तर्क देंगे आप और क्या वे तर्क सुनेंगे? मानेंगे? अगले विधानसभा चुनाव पास ही हैं और मौज़ूदा हालात में विपक्षी दल इस बवण्डर से अधिकतम मुनाफ़ा पाने के बारे में सोच रहे होंगे और शासक दल इस से होने वाले घाटॆ से निबटने की रणनीति बना रहा होगा/ शायद किसी दूसरे जाति को आरक्षण देने की बात कह के या ऐसा ही कुछ और चारा डालने के बारे में/
लेकिन है ही ऐसा कि जैसा बो‍ओगे वैसा काटोगे/ आखिर क्यों चुनाव के दौरान सामाजिक रिश्वतें दी जाती हैं/ भ्रष्टाचार को मिटाने का दावा करने वाली पार्टियाँ जब मुफ़्त साड़ी, मुफ़्त बिजली और बेरोजगारी भत्ते दे के फ़िर से सत्ता में लौटाने का निवेदन करती है तो क्या यह व्यवहार सामाजिक भ्रष्टाचार की परिधि में नहीं आता?

“फलाँ जाति को आरक्षण दे दिया जाएगा… नवयुवकों को बेरोज़गारी भत्ता दिया जाएगा/ महिलाओं को साड़ी बाँटी जाएगी/ चाँद देखने घर से बाहर नहीं निकलना पड़ेगा हम तुम्हारे घर के जीने पे उसे रख देंगे/” बस तुम हमें वोट दो/ बस तुम साड़ी, साइकिल , १०००-५००  रुपये बस इतने में ही खुश हो लो और हमें बेखटके लूट-खसोट का अधिकार दे दो// वोट डालो और अपने घर बैठ जाओ/ हम तुम्हारे ऊपर शासन करेंगे और सत्ता की मलाई को चाटते रहेंगे खजाने को खोखला करते रहेंगे/ तुम हमें वोट नहीं दोगे तो किसी और को दोगे वो भी हमारा भाई है/
और यहीं सवाल उठता है कि क्यों कोई पार्टी ऐसे वादे करती है जो वह  पूरे नहीं कर सकती / क्यों सम्वैधानिक कामों को गैर सम्वैधानिक तरीके से करने की हामी भर दी जाती है और फ़िर जब बोतल से जिन्न बाहर आ जाता है तो सम्हालने में नानी याद आ जाती है/
इस हंगामें में कई जानें जा चुकी हैं, तमाम सूबे में अफ़रा-तफ़री मची है और आग की लपटें पड़ौसी सूबों तक फ़ैल रही हैं/ न सिर्फ़ सूबे की बल्कि मुल्क की बदनामी हो रही है..करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान हो रहा है/ मगर छॊड़ो जनाब किसको पड़ी है/
कहीं ये संघर्ष आने वाले दिनों के समाज की तस्वीर तो नहीं
“यह सपना मैं कहों विचारी! हुइहै सत्य गये दिन चारी/”

चलते चलते एक बात और शिवसैनिकों ने मुम्बई में साइबर कैफ़े में तोड़-फ़ोड़ की…वजह ये थी कि साइबर कैफ़े में नेट होता है/ नेट पर लोग वेबसाइट खोलते हैं/ दुनिया की करोडों वेबसाइट्स में से एक है ओर्कुट जो कि काफ़ी प्रचलित है फ़िलहाल/ इस ओर्कुट के कई लाख सदस्य हैं और उन कई लाख में से कुछ सद्स्यों ने शिवाजी महाराज के बारे में कुछ आपत्तिजनक लिख दिया/ सहज बात है कि शिवसैनिकों के पास इतना समय और अवकाश तो होता नहीं कि नेट पर जरा वास्तविकता परखें/

किसी ने कहा कौआ कान ले गया तो बस दौड़ पड़े कौए के पीछे/ कान देखने की ज़हमत कौन उठाए? चलो मान भी लेता हूँ कि शिवाजी महाराज के बारे मे कुछ आपत्तिजनक लिख दिया था तो भाई उस आदमी को पकड़ते एक लाठी में तो उसका सब शारीरिक भूगोल इतिहास में बदल जाता/ मगर दौड़ पड़े तमाम साइबर कैफ़ेज़ में तोड़-फ़ोड़ करने के लिये/

शिवाजी महाराज का कुछ बनने बिगड़ने वाला नहीं है और याद रखियेगा उन्होंने राज्य बनाया था/ इतिहास में बहुत कम लोग हुए हैं जिन्होंने राज्य का निर्माण किया हो/ वह भी शून्य से उठकर/ उनका नाम बदनाम न करो/

भाई सब लोग सावधान हो जाओ ओर्कुट से अपने अकाउन्ट हटा लो नहीं तो भाई लोग मारने आ जाएंगे/
य घटनाएँ अलग-अलग हैं मगर एक ही चीज़ की ओर संकेत करती हैं वो है कि मुल्क में अराजकता बढ़ रही है/

कभी भी कहीं भी कुछ भी/
जानता हूँ लिखने से क्या होगा? कुछ नहीं/ कोई शान्ति की क्रान्ति नहीं आ जाएगी/ भड़के हुए शोलों पर पानी नहीं पड़ जाएगा मगर यह भी एक तरीका है विरोध का…मैं कम से कम इसका इस्तेमाल तो करूँ/
हिन्दुस्तान क्या तोप के दहाने पर आ खड़ा हुआ है?

5 Comments

  1. अभय तिवारी said,

    June 4, 2007 at 2:58 am

    तोप के एक्दम मुँह पर आकर नहीं पता चलेगा कि आप कहाँ है.. जहाँ भी हैं.. बहुत सुखद और आशावान जगह तो नहीं ही है..

    इतने दिनों से मैं किसी मित्र के इस विषय पर लिखने का इन्तज़ार कर रहा था..आरक्षण विषय पर मेरी सूचनाएं और ज्ञान सीमित है.. इसलिये सकुचाता हूँ..आपने लिखा और बहुत अच्छा लिखा..

  2. Sanjeet Tripathi said,

    June 4, 2007 at 3:30 am

    फ़िलहाल तो तोप के दहाने पर नहीं है लेकिन शायद हम नागरिक यही कोशिश करते रहते हैं कि पहुंच जाएं तोप के दहाने पर!!
    काश यह आरक्षण या तो बंद कर दिया जाए या फ़िर दिया जाए तो सिर्फ़ और सिर्फ़ आर्थिक आधार पर दिया जाए

  3. प्रमोद सिंह said,

    June 4, 2007 at 4:13 am

    अच्‍छा लिखा है, बंधु..

  4. काकेश said,

    June 4, 2007 at 5:51 am

    अच्छा रहा आपका विरोध. हमारे देश में समस्या क्या है कि यदि आप किसी विषय पर बोलें तो आपके विरोधी अपना लुटिया डंडा लेके आपके पीछे पड़ जायेंगे…फिर भी किसी ना किसी को तो बोलना ही पड़ेगा ना…

  5. ghughutibasuti said,

    June 4, 2007 at 12:46 pm

    यदि सभी लोग अपना अपना विरोध इसी तरह दिखाते तो यह संसार जल न रहा होता । आपकी बातें व चिन्ता बिल्कुल सही हैं किन्तु लगता है कि अब केवल भीड़ में ताकत है और हम सबके पास भीड़ से दुबक कर बैठने के सिवाय कोई चारा नहीं है । हम तो केवल इतना कर सकते हैं कि खुद इस भीड़ का हिस्सा न बनें और अपने बच्चों को भी न बनने दें । हर पाँच साल में एक सरकार को हटाएँ और दूसरी को ले आएँ ।
    घुघूती बासूती

Post a Comment