प्रश्न रह जाते हैं अनुत्तरित ही
जो मैने पूछे थे तुमसे
जिनका जवाब मैं जानना चाहता था तुमसे बिना किसी लाग-लपेट के
या तुम मुझसे/
बिना मिश्री की डली में लिपटे
नीम की निबौरी की तरह जिनका हो स्वाद
उन सब सवालों पर पूछते ही पाश बाँध दिये जाते हैं
तर्क के भाषा के, और व्यंजना के
प्रश्न के ढाँचे पर होने लगती है बौद्धिक समीक्षा और बहसें/
ये पूछा सही पूछा मगर ऐसे क्यूँ वैसे क्यूँ?
प्रतिप्रश्न शुरू होते हैं मन्तव्यों पर?
किसने चढ़ाया था तुम्हें पूछने को प्रश्न?
किससे प्ररित थे सवाल?
सवाल इतना ही क्यों उतना क्यों नहीं?
सवाल में पात्र अमुक अमुक ही क्यों फ़लाँ फ़लाँ क्यों नहीं?
और असल बात कहो क्या थे हित निहित सवालकर्ता के?
ढेर ढेर वैचारिक तर्काभासों और उलझनों में सिकुड़ जाते हैं सवाल/
हम फ़िर उलझ जाते हैं बेसिरे की अन्तहीन बहसों में और
और असल चीज़ रह जाती है फ़िर से बेजवाब..
या ऐसे तो नहीं कहीं कि जवाब हो ही नहीं हमारे पास
और ये सिर्फ़ एक तरीका हो सवाल के तरीके पे उलझा के बच निकलने का/
ghughutibasuti said,
May 28, 2007 at 6:57 am
जी हाँ , उत्तर कम ही होते हैं अपने पास । प्रश्न तो सदा ही रहते हैं । पर जब प्रश्न करेंगे तभी तो उत्तरों की भी ढुँढाई होगी । अतः प्रश्न आवश्यक हैं ।
घुघूती बासूती
विकास said,
May 28, 2007 at 7:13 am
कभी एक नाटक पढा था ‘अंधों का हाथी’। सारे सवाल अंधों के हाथी ही हैं। अंधे - जिनके लिए समस्या सवाल नही बल्कि सवाल उठाने वाला सूत्रधार है।
bhaskar said,
May 28, 2007 at 4:32 pm
घुघूती जी सबसे पहले तो धन्यवाद टिप्पणी के लिए..
समस्या सवाल उठाने की नहीं है समस्या जो मैने देखी समझी है (यह कविता एक निजी पारिवारिक स्थिति से प्रेरित है, सो नहीं जानता अन्य सन्दर्भों में कितनी सार्थकता है इसकी) वह ये कि सवाल को छोड़ लोग तरीकों पर, भाषा पर, इन्टेन्शन पर और मन्तव्य पर प्रतिप्रश्न करने लगते हैं..आपका कहना सही है कि जब प्रश्न होते हैं तभी उनके उत्तर की तलाश शुरू होती है/
विकास जी-प्रश्न ओपन एन्डेड होते हैं जबकि उत्तर क्लोज़्ड एन्डेड प्रश्नों की कई सारी विमाएं हो सकती है जो अच्छा ही है ताकि कई अन्य पहलुओं पर भी विचार हो सके..