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	<title>Comments on: बाइ कास्ट क्या हैं आप?</title>
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	<description>संवाद-प्रवाह</description>
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		<title>By: bhaskar</title>
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		<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 12:49:39 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;Thus ends the world not with a bang but with a whimper&quot; सही है भाई धुर-विरोधी जी आपकी बात. इसमें यह और जोड़ूँगा कि एक व्यवस्था को समाप्त करके दूसरे लोगों को वैसी ही व्यवस्था का ध्वजवाहक बनाना हमारा उद्देश्य कतई न हो/ चेहरों के बदलने वाली बात तो नहीं है बल्कि चरित्र बदलने की लड़ाई और लालसा है/ इस बारे में मैं फ़िर याद दिलाना चाहता हूँ कि हम जाति-विहीन समाज चाहते हैं न कि किसी जाति-विशेष के उच्चता और निम्नता का आभास कराने वाली व्यव्स्था/ हो सकता है मायावती का आना एक अपरिहार्य संक्रमण हो इस दिशा में मगर सिर्फ़ ब्राह्मणों के उनके पैर छू लेने से जातिवाद और जातिव्यव्स्था खत्म हो जाएगी ऐसा नहीं माना जाना चाहिए/ कल तक ब्राह्मण पैर छुआते थे आज कोई और ...इससे फ़र्क़ क्या आया? हमारी कोशिश तो इसमें फ़र्क लाने की है न! यह बहुत कुछ सामन्तवाद सरीखा है / सामन्तवाद मिटा, हटा मगर आज भी हम क्या कह सकते हैं कि सामन्तवाद नहीं है/ यह है मगर दूसरे रूप में अपनी सन्तानों को राजनीतिक उत्तराधिकारी के बतौर पेश करने में ..वगेरह वगेरह..यह अपने आप में पूरे लेख का विषय है/ तो अपनी लड़ाई कुछ और है/ दलितों को सम्मान उस लड़ाई में एक कड़ी भर है/
अतुल जी -आपका कहना सही है कि परिवर्तन हो रहा है हो सकता है धीमी गति से हो रहा हो/ हाँ बस इस परिवर्तन की दिशा ठीक ठीक बनी रहे यह ज़रूरी है/</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;Thus ends the world not with a bang but with a whimper&#8221; सही है भाई धुर-विरोधी जी आपकी बात. इसमें यह और जोड़ूँगा कि एक व्यवस्था को समाप्त करके दूसरे लोगों को वैसी ही व्यवस्था का ध्वजवाहक बनाना हमारा उद्देश्य कतई न हो/ चेहरों के बदलने वाली बात तो नहीं है बल्कि चरित्र बदलने की लड़ाई और लालसा है/ इस बारे में मैं फ़िर याद दिलाना चाहता हूँ कि हम जाति-विहीन समाज चाहते हैं न कि किसी जाति-विशेष के उच्चता और निम्नता का आभास कराने वाली व्यव्स्था/ हो सकता है मायावती का आना एक अपरिहार्य संक्रमण हो इस दिशा में मगर सिर्फ़ ब्राह्मणों के उनके पैर छू लेने से जातिवाद और जातिव्यव्स्था खत्म हो जाएगी ऐसा नहीं माना जाना चाहिए/ कल तक ब्राह्मण पैर छुआते थे आज कोई और &#8230;इससे फ़र्क़ क्या आया? हमारी कोशिश तो इसमें फ़र्क लाने की है न! यह बहुत कुछ सामन्तवाद सरीखा है / सामन्तवाद मिटा, हटा मगर आज भी हम क्या कह सकते हैं कि सामन्तवाद नहीं है/ यह है मगर दूसरे रूप में अपनी सन्तानों को राजनीतिक उत्तराधिकारी के बतौर पेश करने में ..वगेरह वगेरह..यह अपने आप में पूरे लेख का विषय है/ तो अपनी लड़ाई कुछ और है/ दलितों को सम्मान उस लड़ाई में एक कड़ी भर है/<br />
अतुल जी -आपका कहना सही है कि परिवर्तन हो रहा है हो सकता है धीमी गति से हो रहा हो/ हाँ बस इस परिवर्तन की दिशा ठीक ठीक बनी रहे यह ज़रूरी है/</p>
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		<title>By: धुरविरोधी</title>
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		<dc:creator>धुरविरोधी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 09:58:20 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;अभी ४ दिन पहले हमारे गाँव के पास वाले गाँव में दलितों को दबंगों ने एक महिला का 
अन्तिम संस्कार नहीं करने दिया&quot;
लेकिन कौन जीता,  दबंग या दलित? उस महिला का अंतिम संस्कार हुआ और दबंगों की छाती पर हुआ. 
भास्कर जी और अभय जी;  मैं तो पूरी ताकत से विश्वास करता हूं कि एसा होगा.  कौन सोचता था कि मायावती मुख्यमंत्री बनेंगीं और ब्राह्मण उनके पैर छुयेंगे ?  
आज जो बहुत कुछ हो रहा है वो कल तक हमारी पिछली पीढ़ी सोच तक नहीं सकती थी.
शहरों में तो काफी परिवर्तन आ चुका है. गांव खेड़े भी कितने दिन अछूते रहेंगे ?  
केवल एक-डेड़ दशक और इन्तजार करते हैं.  और परिवर्तन सुनामी की तरह नहीं दबे पांव आयेगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;अभी ४ दिन पहले हमारे गाँव के पास वाले गाँव में दलितों को दबंगों ने एक महिला का<br />
अन्तिम संस्कार नहीं करने दिया&#8221;<br />
लेकिन कौन जीता,  दबंग या दलित? उस महिला का अंतिम संस्कार हुआ और दबंगों की छाती पर हुआ.<br />
भास्कर जी और अभय जी;  मैं तो पूरी ताकत से विश्वास करता हूं कि एसा होगा.  कौन सोचता था कि मायावती मुख्यमंत्री बनेंगीं और ब्राह्मण उनके पैर छुयेंगे ?<br />
आज जो बहुत कुछ हो रहा है वो कल तक हमारी पिछली पीढ़ी सोच तक नहीं सकती थी.<br />
शहरों में तो काफी परिवर्तन आ चुका है. गांव खेड़े भी कितने दिन अछूते रहेंगे ?<br />
केवल एक-डेड़ दशक और इन्तजार करते हैं.  और परिवर्तन सुनामी की तरह नहीं दबे पांव आयेगा.</p>
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	<item>
		<title>By: अतुल शर्मा</title>
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		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 09:17:52 +0000</pubDate>
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		<description>आज की तुलना 50 साल पहले के समाज से करें, आप पाएँगे कि आज का समाज उस समय से अधिक खुला और बेहतर है। परिवर्तन भले ही धीमा हो परंतु हो रहा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज की तुलना 50 साल पहले के समाज से करें, आप पाएँगे कि आज का समाज उस समय से अधिक खुला और बेहतर है। परिवर्तन भले ही धीमा हो परंतु हो रहा है।</p>
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		<title>By: bhaskar</title>
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		<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 08:50:32 +0000</pubDate>
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		<description>बिल्कुल अभय जी.. मेरा भी मानना यही है कि ये भेद मिट जाएंगे ऐसा मानना सिर्फ़ खुद को खामख्याली में डालने के माफ़िक होगा/ अभी ४ दिन पहले हमारे गाँव के पास वाले गाँव में दलितों को दबंगों ने एक महिला का अन्तिम संस्कार नहीं करने दिया/ प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद स्थिति सम्हली/ तो अभी एक मुद्दा तो मानसिकता का है/ दूसरा अपने बुद्धिजीवी लोग समस्या सुलझाने में कम उसके दाँए-बाँए पक्ष में ज्यादा रुचि लेते हैं/ परसाईं जी ऐसे में याद आते हैं जो लिख गये हैं -&quot;यदि आप बुद्धिजीवी से भूख से मर रहे लोगों के बारे में चर्चा करेंगे तो वो आपको वर्ल्ड बैंक के खाद्य उत्पादन के आँकड़े बताने लगेगा/&quot; खैर बुद्धिजीवी भाई लोग नाराज़ न होना/</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिल्कुल अभय जी.. मेरा भी मानना यही है कि ये भेद मिट जाएंगे ऐसा मानना सिर्फ़ खुद को खामख्याली में डालने के माफ़िक होगा/ अभी ४ दिन पहले हमारे गाँव के पास वाले गाँव में दलितों को दबंगों ने एक महिला का अन्तिम संस्कार नहीं करने दिया/ प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद स्थिति सम्हली/ तो अभी एक मुद्दा तो मानसिकता का है/ दूसरा अपने बुद्धिजीवी लोग समस्या सुलझाने में कम उसके दाँए-बाँए पक्ष में ज्यादा रुचि लेते हैं/ परसाईं जी ऐसे में याद आते हैं जो लिख गये हैं -&#8221;यदि आप बुद्धिजीवी से भूख से मर रहे लोगों के बारे में चर्चा करेंगे तो वो आपको वर्ल्ड बैंक के खाद्य उत्पादन के आँकड़े बताने लगेगा/&#8221; खैर बुद्धिजीवी भाई लोग नाराज़ न होना/</p>
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		<title>By: अभय तिवारी</title>
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		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 06:46:32 +0000</pubDate>
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		<description>लेकिन मुझे लगता है कि आपका सपना अभी निकट भविष्य में पूरा नहीं होने वाला .. मैं भी चाहता हूँ कि समता मूलक समाज बने.. पर मित्र ये भेद इतनी आसानी से मिट जायेंगे.. ये सोचना थोड़ा बचकाना होगा.. हाँ इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि अभी हम ऐसे समय में है जब ऐसा समाज बनाना एक सम्भावना है.. दूसरी भौतिक परिस्थितियां अनुकूल है.. तभी आज ये बाते हो सकती है.. आदमी के मन की दुनिया विचित्र होती है.. कभी तो प्रतिकूल समाज में भी एक बुद्ध जन्म ले लेता है.. और कभी सभी असमानताए मिट जाने पर भी मन में दुराग्रह पड़ा रह जाता है..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लेकिन मुझे लगता है कि आपका सपना अभी निकट भविष्य में पूरा नहीं होने वाला .. मैं भी चाहता हूँ कि समता मूलक समाज बने.. पर मित्र ये भेद इतनी आसानी से मिट जायेंगे.. ये सोचना थोड़ा बचकाना होगा.. हाँ इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि अभी हम ऐसे समय में है जब ऐसा समाज बनाना एक सम्भावना है.. दूसरी भौतिक परिस्थितियां अनुकूल है.. तभी आज ये बाते हो सकती है.. आदमी के मन की दुनिया विचित्र होती है.. कभी तो प्रतिकूल समाज में भी एक बुद्ध जन्म ले लेता है.. और कभी सभी असमानताए मिट जाने पर भी मन में दुराग्रह पड़ा रह जाता है..</p>
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		<title>By: अभय तिवारी</title>
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		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 06:39:21 +0000</pubDate>
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		<description>बढ़िया लिखा भाई..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बढ़िया लिखा भाई..</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: bhaskar</title>
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		<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 06:01:05 +0000</pubDate>
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		<description>धुर विरोधी जी, भगवान करे आपकी बात सही साबित हो जल्दी से जल्दी (शादी वाली नहीं बल्कि जाति विहीन समाज वाली) इसमें कोई आपत्ति नहीं कि जिनको जाति का पुछल्ला चिपका के रखना है वे रखें उनकी मर्ज़ी है मगर जाति को किसी प्रकार के discrimination का आधार न बनाया जाए बस इतनी सी बात है/
हालाँकि ये थोड़ा देखने वाली बात है कि ये स्वप्न कब तक पूरा होता है क्योंकि नयन में सपने भले हों पैर पृथ्वी पर खड़े हों&quot; अपन अपने गाँव- खेड़े में जो देख रहे है उससे अभी जाति के महत्व के बढ़ने का ही आभास होता है हो सकता राजनीतिक वोट-बैंक का खेल हो मगर लगता तो यही है कि जिस जाति की संख्या जितनी ज़्यादा है उसे उतना ही महत्व मिल रहा है इसके चलते जातिव्यवस्था अप्रत्यक्ष रूप से पुष्ट ही हो रही है/</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>धुर विरोधी जी, भगवान करे आपकी बात सही साबित हो जल्दी से जल्दी (शादी वाली नहीं बल्कि जाति विहीन समाज वाली) इसमें कोई आपत्ति नहीं कि जिनको जाति का पुछल्ला चिपका के रखना है वे रखें उनकी मर्ज़ी है मगर जाति को किसी प्रकार के discrimination का आधार न बनाया जाए बस इतनी सी बात है/<br />
हालाँकि ये थोड़ा देखने वाली बात है कि ये स्वप्न कब तक पूरा होता है क्योंकि नयन में सपने भले हों पैर पृथ्वी पर खड़े हों&#8221; अपन अपने गाँव- खेड़े में जो देख रहे है उससे अभी जाति के महत्व के बढ़ने का ही आभास होता है हो सकता राजनीतिक वोट-बैंक का खेल हो मगर लगता तो यही है कि जिस जाति की संख्या जितनी ज़्यादा है उसे उतना ही महत्व मिल रहा है इसके चलते जातिव्यवस्था अप्रत्यक्ष रूप से पुष्ट ही हो रही है/</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: धुरविरोधी</title>
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		<dc:creator>धुरविरोधी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 05:04:29 +0000</pubDate>
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		<description>जाति विहीन समाज का सपना साकार करना एकदम संभव है.
आप किसी और जाति धर्म की लड़की या लड़के से शादी कर लीजिये.  अधिक जानकारी चाहिये तो रेडियोवाणी वाले यूनुस जी से मिलिये.

और आपकी पीढ़ी ने जो किया वो किया, आने वाली पीढ़ी कम से कम आप की पीढ़ी जितनी तंगदिल नहीं होगी.  समाज में जाति-धर्म गौण हो जायेंगे.

विश्वास रखिये, एसा होगा, होगा और जरूर होगा</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जाति विहीन समाज का सपना साकार करना एकदम संभव है.<br />
आप किसी और जाति धर्म की लड़की या लड़के से शादी कर लीजिये.  अधिक जानकारी चाहिये तो रेडियोवाणी वाले यूनुस जी से मिलिये.</p>
<p>और आपकी पीढ़ी ने जो किया वो किया, आने वाली पीढ़ी कम से कम आप की पीढ़ी जितनी तंगदिल नहीं होगी.  समाज में जाति-धर्म गौण हो जायेंगे.</p>
<p>विश्वास रखिये, एसा होगा, होगा और जरूर होगा</p>
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