चिन्ता की चिन्ता
मेरा पसन्दीदा काम है तरह तरह के मुद्दों पर चिन्ता व्यक्त करना.. इससे और कुछ हो न हो महानता का आभास ज़रूर होता है और समाज के लिए कुछ कुछ करने की फ़ोकटिया सन्तुष्टि भी मिलती है/
अलग अलग समय अलग अलग प्रकार की चिन्ताओं के लिए नियत हैं जैसे सुबह कूड़े से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण पर और दोपहर राजनीतिक चिन्ताओं देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार आदि आदि सार्वभौमिक और सर्वकालिक चिन्ताओं के लिए नियत हैं/ एक और पसन्दीदा विषय है ग्लोबलीकरण और प्राइवेटीकरण से बढ़ता असन्तुलन (यह चिन्ता तब ज़्यादा करता हूँ जब किसी मॉल में शॉपिंग करने जाता हूँ)/ दोस्त कहते हैं नए कपड़े और पर्फ़्यूम्स लेते वक़्त ये चिन्ता आपके चेहरे पर खूब छजती है/
चिन्ता कर देने के बाद उस विषय को एक छींके पे टाँग देता हूँ ताकि वक्त ज़रूरत पे काम आए/ वैसे इस से मेरा फ़ायदा बहुत हुआ है/ कॉलेज में जब हम पढ़ते थे तो मौके-बेमौके चिन्ता प्रदर्शन की वजह से ही हमको भाषण-वाद विवाद किस्म के निहायत बोर(श्रोताओं के लिए) कामों में कालेज का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेज दिया जाता था/ मन्च पर भी इसने मेरा साथ खूब निभाया/ अगर मेरे पास विपक्षी को प्रतिरोध के तर्क नहीं होते तो मैं कह दिया करता था कि मेरी भी चिन्ता है यही है वगेरह वगेरह (चित भी मेरी पट भी मेरी) इससे क्या होता था कि दोनों तरफ़ के मुद्दों पर चिन्ता व्यक्त कर दिया करता था और दोनों तरफ़ के तर्कों का इस्तेमाल कर लिया करता था/ ये दो नाव पर सवारी या कम से कम छूते हुए चलने का काम बड़ा फ़ायदेमन्द होता है/ प्रबन्धन की पढ़ाई के दौरान हमारे एक प्रोफ़ेसर साब जब भी लड़कों के जाल में फ़सते तो हमेशा कहने लगते थे “its not ‘either-or’ its ‘and-also’.”और हम उनके बौद्धिक आतंक से पीड़ित छात्र गदगद मुद्रा में आ जाते थे /
वैसे ये सिर्फ़ मेरा नहीं बल्कि ज़्यादातर महानुभावों और बौद्धिकों का काम है. बहुत बार ऐसा होता है कि चिन्ता न करो तो ऐसा लगता है कुछ खास काम अधूरा छूट गया..ईमानदारी से कहूँ तो ऐसा लगता है कि कब्ज़ की बीमारी की वजह से नित्यकर्म ठीक नहीं हुआ इस तरह का मुँह बन जाता है..
चिन्ता करने का सबसे बड़ा पहलू यह है कि जो आप सोचना चाह रहे है या जैसा सोचते हुए दिखना चाहते हैं उस तरीके की शक्लें आपको बनानी आनी चाहिए वरना यह काम गैर ज़िम्मेदाराना चिन्तन की केटेगरी में आ जाता है.. दूसरा महत्वपूर्ण फ़ैक्टर है कि आप को सिर्फ़ चिन्ता व्यक्त करनी है उन मुद्दों का समाधान कतई नहीं प्रस्तुत करना यहाँ तक कि उस दिशा में सोचने की भी मनाही है.. अगर आप समाधान करने पे उतारू हो गये तो फ़िर दूसरे दिन चिन्ता किस बात पर होगी? इसके अलावा एक चीज़ और है कि आप को विभिन्न मुद्दों पर चिन्ता व्यक्त करनी है उन मुद्दो से आपका सहमत असहमत होना एक्दम अलग चीज़ है..बिना किसी तरह की राय बनाए हुए आपको निष्पक्ष भाव से चिन्तित होते रहना चाहिए/
आप देश में बढ़ती हुई महगाई पर भी चिन्तित हो सकते है और देश की बढ़ती हुई विकास दर पर भी/ आप किसानों की आत्महत्या पर एक समय में चिन्तित हो सकते है और आपके शहर में मॉल के न होने पर उतनी ही सहजता से चिन्तित हो सकते हैं/ शहर में बढ़ रही कुत्तों की आबादी से रैबीज़ के खतरे पर शाम को चिन्ता व्यक्त की जा सकती है और सुबह उनके मारने से उत्पन्न होने वाली जैव-विविधता के संकट पर/.. कुल जमा बात ये कि चिन्तित होने के लिए कोई भी मुद्दा हो सकता है/ और याद रखिए कि ये मुद्दे ज़रूरी नहीं कि आपस में संबन्धित हों/
शाम को जब मैं सोता हूँ तो इस तरह का भाव चेहरे पर बार -बार आ जाता है कि हे मूढ़ समाज, ऐ एहसानफ़रामोश मुल्क़ ज़रा देखो तो सही मैने तेरे लिये इतनी चिन्ता की/ पूरा दिन दिन भर अपनी चिन्ताओं से दूसरों को अवगत कराता रहा/ लेकिन मुझे क्या मिला? मेरे घर में ए.सी.तक नहीं लगवाया तुम लोगों ने/ फ़िर मैं अपने कोटे की आखिरी चिन्ता करने के बाद टिटहरी जैसे टाँग उठा के सो जाता हूँ और सोते सोते सोचता हूँ कि देखो अच्छा हुआ आज इतनी चिन्ता कर ली वरना दुनिया का क्या होता?
Nitin Bagla said,
May 23, 2007 at 1:55 pm
बहुत पहुँचे हुए बुद्धिजीवी किसम के आदमी हो यार…सारी दुनिया का बोझ उठाये हुए हो
संजय बेंगाणी said,
May 23, 2007 at 1:58 pm
आप हैं तो यह दुनियाँ बचे हुई है.
paramjitbali said,
May 23, 2007 at 4:11 pm
अब तो हमे भी चिन्ता हो रही है कि हम चिन्ता क्यूँ नही कर पा रहे थे।आज आप की चिन्ता से हम भी काफी चिन्तित हैं।
अभय तिवारी said,
May 23, 2007 at 4:50 pm
आप थे कहाँ अब तक ? चलिये कुछ हाथ बँटाइये.. अकेले चिंता करते करते थे अपनी हालत चिन्ताजनक हो गई है.. ब्लॉग समाज को आप ही जैसे एक चिन्तक की घोर आव्श्यक्ता है..
राजलेख की हिंदी पत्रिका said,
May 23, 2007 at 6:38 pm
चिंता सम नास्ति शरीरं शोषणम-चिंता के समान शरीर को हानि और कौन पहुंचा सकता है
दीपक भारत दीप
bhaskar said,
May 24, 2007 at 2:42 am
नितिन बाबू -आप तो पुराने दोस्त हो जानते ही हो कि हम कितने चिन्तामग्न आदमी हैं
संजय जी, परमजीत जी, अभय जी, दीपक जी आप सबका शुक्रिया ब्लॉग पर टिप्पणी करने के लिए/ मुझे लगता है हमारे समाज की समस्या एक ये भी है कि हम सोचते बहुत हैं और करने के नाम पर ठन-ठन गोपाल/ मैं भी ऐसा ही करता हूँ क्यूँकि समाज से इतर नहीं हूँ/
Santosh said,
May 24, 2007 at 3:29 am
महोदय, हम तो आपसे चिन्ता के साथ आपसे ठोस प्रयासों की भी आस लगायें हैं। … आप नहीं तो कौन ?
Zakir Ali 'Rajneesh' said,
May 24, 2007 at 5:42 am
आपका ब्लागिंग की दुनिया मे सवागत है। ये जानकर अच्छा लगा कि आप लखनऊ से हैं।