लोकभाषाओं के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न
भाषा सम्बन्धी चिन्ता और चिन्तन आजकल एक पुरातन सोच का प्रतीक है..ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में इस प्रकार की चर्चा गैर-सामयिक और अप्रासंगिक मानी जा रही है/ नहीं जानता कि क्यूँ?
भाषा सम्बन्धी चिन्ताओं से किसी को अवगत कराओ तो वे कहते हैं क्या गैर प्रोडक्टिव सोचते रहते हो..कोई कहता है यार आज मार्केट इतना चढ़ गया तुमको भाषा की चिन्ता सता रही है/
ये चिन्ताएँ काफ़ी बार व्यक्त की गई है और कतिपय बार इसका संज्ञान भी लिया गया है/ मगर समस्या यह है कि यह खबर न तो फ़ौरी तौर पर सरसरी पैदा करती है न ही कोई जिज्ञासुकीय उत्तेजना का महौल बनाती है/ सब कुछ ठीक चलता रहता है सिवाय इस डर के कि अगर हम शतायु हुए तो शायद अपनी भाषाओं में बात करने के लिये भी तरस जाएं..
खबर ये है कि दुनियाँ की आधी से ज़्यादा भाषाएँ अगले १०० सालों में लुप्त हो जाएंगी/ हालाँकि यह ऐसा पहला समाचार नहीं है…इसके पहले भी कई बार इसके मुतल्लिक़ खबरें शाया हो चुकी हैं/ यूनाइटेड नेशन्स ने भी अपना एक वर्ष भाषाओं को समर्पित किया था/ मगर इतनी बड़ी संस्था के अपना पूरा एक साल दे देने के बावज़ूद कम्बख्त भाषाओं की दरिद्रता में कोई परिवर्तन हुआ नहीं.
बहरहाल इस लेख के मूल में चिन्ता का मुद्दा ये तो नही ही है कि हिन्दी बचेगी या नहीं (जैसा कि प्रायः लोग सोचने लगते हैं, जब भी भाषा सम्बन्धी चर्चाएँ शुरू होती हैं) मेरा पुरा विश्वास है और यह विश्वास भावुकता पर नहीं बल्कि खरे आँकड़ों पर आधारित है, कि हिन्दी न सिर्फ़ बचेगी बल्कि बढ़ेगी भी/
इस खबर में जो महत्वपूर्ण बात है वह ये कि खतरे का इंगित सिर्फ़ बहुत छोटी भाषाएँ ही नहीं बल्कि विशालतर पैमाने पर फ़ैली हुई भाषाएँ भी हैं जिनका क्षेत्र घटने की सम्भाव्यता व्यक्त की गई है/ बहरहाल मैं समझता हूँ कि फ़िक़्र का सबसे बड़ा सबब ये है कि हमारी बोलियाँ बचेंगी या नहीं यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं था उस समाचार में कि उन्होंने बोलियों को (परिभाषानुसार जिनकी खुद की लिपि न हो बल्कि वे सिर्फ़ बोली जातीं हों) भाषा माना है या नहीं, अन्यथा आँकड़े और डरावने हो सकते हैं/
भाषा की वाचिक परम्परा एक सामाजिक ही नहीं बल्कि आर्थिक क्रियोत्पाद (फ़ंक्शन) भी है/ इसको एक छोटे उदाहरण से स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ – जब तक व्यक्ति अपने खेत खलिहान से जुड़ा होता है, उच्चतर परिधियों में नहीं आता है, वह अपनी लोकभाषा या बोली बोलता है/ जैसे ही उसका अपग्रेडेशन होता है आर्थिक स्तर वह सामाजिक स्तर में भी उत्तरोत्तर प्रगति करता है और क्रमिक ढंग से अपने से श्रेष्ठतर समझे जाने वाले समुदाय की भाषा, संस्कृति, कला, रीति-रिवाज़ सब में उच्चतर समुदायों का अनुसरण करने का प्रयास शुरू कर देता है/
भाषिक परिवर्तन और बोली के भाषा में संक्रमण की शुरुआत यहीं से होती है/ वह व्यक्ति और समुदाय अपने से बेहतर वर्ग की भाषा (उदाहरण के लिए हिन्दी) बोलना (खड़ी बोली) शुरू कर देता है/ यह जो अपग्रेडेशन का स्तर है जब वह और बढ़ता है तो क्रमशः वह आदमी अंग्रेज़ी बोलना शुरू करता है/ यह एक सामान्य उदाहरण है कि आय के बढने के साथ ही व्यक्ति अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालय में पढ़ाना चाहता है और उसके मुंह से “ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार” की पोयम सुनना चाहता है/
किसी भाषा को श्रेष्ठता के स्तर के साथ कैसे जोड़ा जाता है या यूं कहें कि कैसे जुड़ जाती हैं इसके अपने ऐतिहासिक और सामाजिक-आर्थिक कारं होते हैं इन पर विस्तार से चर्चा कभी और/ इस विचार को ऐसे भी कहा जा सकता है कि “जैसे जैसे संस्कृतिकरण होता जाता है आदमी अपने पुराने चोले को हटा देना चाहता है और उस वर्ग की भाषा संस्कृति कला यहाँ तक कि विचारों को अपना लेना चाहता है जो उसे अपने से श्रेष्ठ वर्ग लगता है या दूसरे शब्दों में कहें तो प्रभु वर्ग/”
जैसा कि पहले ही मैने यह स्पष्ट किया कि यहाँ चिन्ता की बात यह नहीं है कि हिन्दी रहेगी या नहीं हालाँकि कोई अनन्त काल के लिए तो कोई भाषा नहीं रहती मगर चिन्ता का मुद्दा है बोलियों का बचना…क्योंकि जैसे ही आदमी शिक्षित होता है, आर्थिक समृद्धि प्राप्त करता है, वह अपनी बोली को बोलना छोड़्ने लगता है/
सांस्कृतिक प्रवाह में और समय की धारा में भाषाएँ आती जाती रहती हैं/ नई नई भाषाएं पुरानी भाषाओं का स्थान लेती रहती हैं/ यहाँ तक कि पाली और प्राकृत जैसी धार्मिक भाषाएँ भी अनन्त काल के लिए नहीं होतीं उन पर भी विलोप के खतरे मँडराए होंगे और उनका प्रचलन समाप्त हो गया होगा.. बदलते हुए सांस्कृतिक परिदृश्य में खतरे की घंटी लोकबोलियों के लिये है/ यह सांस्कृतिक परिदृश्य निश्चित रूप से आर्थिक और तकनीकी परिवर्तनों से प्रभावित होता ही है/ यदि बोलियों बोलने में, उनमें बतियाने में, सम्वाद स्थापित करने में यदि समुदायों को हीनभावना लगने लगे (अनजाने में ही सही) तो उन बोलियों का अस्तित्व कैसे टिक सकता है/ दुनियाँ की कोई भी बोली हो कोई भी मगर जन जीवन से जुड़े हुए और दैनन्दिन चर्या से जुड़े हुए शब्द जो आपको बोलियों में मिलेंगे वे उस बोली से सम्बद्ध कथित श्रेष्ठ भाषा में नहीं मिल सकते/ मैं यहाँ उ.प्र. और म.प्र. में बोली जाने वाली बोली बुन्देली का उदाहरण रखना चाहता हूँ/ खेत खलिहान और ज़मीनी अभिव्यक्ति से जुड़े हुए शब्द कुछ तो इसमें ऐसे हैं कि काफ़ी प्रयास के बावज़ूद मैं हिन्दी में उनके समानार्थी खोज नहीं सका/ मैं समझता हूँ कि ऐसा ही बाकी तमाम सारी बोलियों के साथ भी है/
बोलियों के साथ एक और चीज़ है कि वे ग्रामीण परिवेश के साथ समायोजित है और उस परिवेश के साथ ही बोलियों को एसोसिएट किया जाता है/ सामाजिक स्तरीकरण के चरण जैसे जैसे पार होते है, वैसे-वैसे व्यक्ति स्वयं को नगरीय सभ्यता के साथ जोड़ने का आकांक्षी होता है और ग्रामीण सभ्यता वाली पहचान से खुद को पृथकीकृत करना चाहता है/ इस ज़द्दोजहद में हानि होती है बोलियों की/
इस प्रकार के सामाजिक स्तरीकरण में सिर्फ़ बोलियों का नुकसान नहीं होता बल्कि यूं कहें कि तमाम सारी लोक-परम्पराओं विशेषकर ग्राम-सभ्यता की ओर खतरे का एक और क़दम सरक आता है/
बोलियाँ अपने साथ सिर्फ़ इतिहास गौरव नहीं लिये हुए हैं बल्कि संस्कृति का बहुत सारा सत्व और सामाजिक चिन्तन इनमें समाया हुआ है/ वाचिक परम्परा के तहत शामिल कथा, गीत और अन्य कलाएँ इसके अतिरिक्त हैं/ हालाँकि यह कहना बहुत मुश्किल है कि क्या बचेगा और क्या नहीं क्योंकि समय की आँधी में तमाम संस्कृतियाँ, बोलियाँ, भाषाएं यहाँ तक कि धर्म और पन्थ भी उड़ गए, मगर इस दफ़ा आँधी की रफ़्तार कुछ ज़्यादा ही तेज़ है/ भाषाओं के बनने बिगड़ने का क्रम चलता रहता है/ अनादिकाल से यह प्रवाह सभ्यता को गतिमान रखे हुए है मगर इसके पहले तक भाषाएं एक क्रम्बद्ध तरीके से उत्तरोत्तर विकसित और परिमार्जित होती रहीं/ कई सारी भाषाएँ संस्कृत से निकली और स्वतन्त्र रूप में भी उनका अस्तित्व रहा/ अब प्राकृत, अपभ्रंश, पाली, इत्यादि के ही कई सारे रूप हुआ करते थे जिनसे तमाम सारी बोलियों का विकास हुआ. मागध प्राकृत से मगधी का उद्भव हुआ तो शौरसेनी प्राकृत से बृज बोली का/ मगर इन भाषाओं का लोप नहीं हुआ बल्कि दूसरी बोलियों या भाषाओं में परिवर्तन और परिवर्धन होता रहा/
अभी स्थिति थोड़ी जुदा है/ खतरा यह है कि कुछ विशेष भाषाओं का ही अस्तित्व रह जाएगा और बाकी की निपट जाएंगी/ भाषा के बहुलवाद की समाप्ति का खतरा असली खतरा है/ हालाँकि भाषा के अनावश्यक शुद्धिकरणवादी पैरोकारों से मैं इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता मगर ये ज़रूरी तो है ही कि कम से कम किसी भाषा को शुद्ध रूप में जानने समझने वाले लोग बचे तो रहें/ यह बात बोलियों के सन्दर्भ में भी सत्य है/ मैने स्वयं अपनी बोली बुन्देली में नोटिस किया है कि ऐसे कई सारे शब्द हैं जो आज मेरी पीढ़ी को पता ही नहीं हैं या फ़िर उनका स्थान हिन्दी के शब्दों ने ले लिया है इसकी वजह ये भी हो सकती है कि अब वे शब्द अप्रासंगिक हो गए हैं या अनुपयुक्त/ यदि कोई वस्तु ही लोगों को देखने को न मिले तो उसकी संज्ञा शब्दों का संरक्षण कैसे किया जा सकता है? शब्दों का कोई प्रेज़र्वेशन कर के तो रखने का औचित्य है नहीं/
किसी भाषा का लोप होना सिर्फ़ उस भाषा का मरना नहीं है वरन् एक सम्पूर्ण संस्कृति समुच्चय का अवसान होना है/
भाषा सम्बन्धी विमर्श को आगे बढ़ाते हुए इस में यह बिन्दु जोड़ना भी आवश्यक है भाषा का फलते फूलते रहना एक जीवन शैली का और वैचारिक समुत्पादों का, एक संस्कृति का बने रहना है/
इन सब तर्कों प्रतितर्कों और समझ के बावज़ूद यह सवाल हमारे सामने बना हुआ है कि बोलियों को कैसे बचाया जाए? और उसके पहले ये कि क्या वाकई बचाने की ज़रूरत है? और यदि हाँ तो कैसे? या फ़िर इस परिवर्तन की प्रक्रिया को जस का तस स्वीकार कर लिया जाए? बिना किसी ना-नुकर के/ कुल ज़मा बात ये कि क्या इस भाषाई क्षरण की गति को कुछ मन्दीकृत किया जा सकता है या कम से कम स्थिर किया जा सकता है? मैं उत्तर नहीं दे सकता क्योंकि जटिलीकृत होती जाती आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में उत्प्रेरक कारक न सिर्फ़ बहुत सारे हो गए हैं बल्कि उनके संयोजन भी अत्यधिक हैं/ भाषाओं का सवाल फ़िलहाल तो अनुत्तरित ही रखता हूँ हालाँकि जवाब शायद नकारात्मक हो जिसकी सम्भावना मुझे ज़्यादा लगती है/
जीतू said,
May 10, 2007 at 9:01 am
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