पगडंडी के रास्ते किताब

May 3, 2007 at 7:54 pm (कुछ इधर की कुछ उधर की)

 कभी कभी लोग पूछते हैं या बुद्धिजीवी किसिम के दोस्त ज़रूर पूछते हैं कि भाई भास्कर आजकल क्या पढ़ रहे हो? अब सामान्य तौर पर हम कुछ पढ़ते लिखते तो हैं नहीं मगर बुद्धिजीवी दोस्त पूछ के शर्मिन्दा न हो जाएँ इसलिये कुछ बताना लाज़िमी हो जाता है/ अगर हम कह दें कि भाई आजकल नौकरी से फ़ुर्सत मिल ही नहीं रही कि कुछ पढ़ें या यूँ कि शाम को आके हम खाना बनाने में व्यस्त हो जाते हैं इसलिये पढ नहीं पा रहे, तो जितनी शर्म हमें नहीं आएगी उससे ज़्यादा मेरे दोस्त को आएगी कि देखो तो साले को हमारा दोस्त होने का गौरव भी प्राप्त कर रहा है और कुछ पढ़ता ही नहीं है/
इस प्रकार के अप्रिय प्रसंगों से बचाने के लिए मैं कुछ न कुछ बता दिया करता हूँ..वैसे बहुत से भाइयों ने मुझे एक राज़ की बात बताई है आपसे भी शेअर कर सकता हूँ.. वो ये कि जो खाँटी बुद्धिजीवी बनना चाहे उसे पढ़ना अनिवार्य नहीं है/ बुद्धिजीवी लोग किताबें नहीं पढ़ते वे लोग लेखकों को पढ़ते हैं दर-असल वे माल नहीं खरीदते ब्रांड खरीद कर खुश हो रहे होते है/ एक तरीका और है उसे पगडंडी पढ़ाई कहते हैं/ पगडंडी पढ़ाई होती है जैसे हम लोग १०वॊईं १२वीं में पढ़ा करते थे/ मुख्य मुख्य प्रश्नों के उत्तर रट के चले जाते थे और एग्जामिनेशन हॉल में उल्टी कर के भाग आते थे/ बहुत से लोग पगडंडी जेब में रख के भी एग्जाम हाऑल चले आते थे/
इस तरीके के पढ़ाई का मुख्य सिद्धान्त है कि किताब का रिव्यू पढ़ लो/ आलोचना वाले विद्वान उस किताब की अच्छाई बुराई लिख ही देते हैं कण्टेण्ट के बारे में भी पता चल जाता है/
इसके बाद किताब से उद्धरण निकाल के २-४ कहीं नोट कर लो ताकि मौक़े बेमौक़े काम आ सकें/ बाकी बचता है काम लेखक का नाम पता याद रखने के तो वो आसानी से किया जा सकता है/
कभी कभी मैं उन लोगों की प्रतिभा से बहुत कुण्ठित महसूस करता हूँ जो एक बार मे ३-४ नोवेल, २-३ गैर-फ़न्तासी ग्रन्थ और ८-१० दीगरकिताबों का अध्ययन कर रहे होते हैं/ मैं सोचने लगता हूँ यार ऐसे ज़्यादा नहीं कुछ ३-४ हज़ार लोग हिन्दुस्तान में हो जाएं तो लेखकों की गरीबी और पाठकों का अभाव जैसी चिरन्तन समस्याएँ मिट जाए क्योंकि इन लोगों को एक ही समय में १५-२० किताबें पढ़ने की आदत होती है/
ये लोग असल में किताबों की पगडंडियों से गुज़र के पुस्तकों का रसास्वादन करते हैं/
एक दूसरा रास्ता है पम्फ़्लेट पुस्तक का गहन अध्ययन/ ये थोड़ा अलग तरह के पाठक होते हैं जो दुनियाँ के सब विषयों पर न सिर्फ़ कुछ न कुछ पढ़ चुके होते हैं बल्कि शायद ३-४ हज़ार विषयों पर उनकी डॉक्टरेट कम्प्लीट हो गई होती है/ ये सज्जन पम्फ्लेट को भी किताब का आदर देते हैं और उस पम्फ़्लेट को ही बाद में थोड़ा थोड़ा तानते खींचते किताब में बदल देते हैं/
आयुर्वेद की किसी दुकान का विज्ञापन भर पढ़ लेने से इनको आयुर्वेद के निघण्टुओं तक की जानकारी हो जाती है/
मेरे एक मित्र हैं वे सिर्फ़ पढ़ने के लिये पढ़ते हैं/ अच्छी बात है कुछ लोग खाने के लिये ही जीते हैं, ये पढ़ने के लिये जीते हैं/ वे कहते हैं कि मैं सब कुछ पढ्ता हूं वेद्प्रकाश शर्मा से ले के …….. (अंग्रेज़ी के कुछ बड़े नाम थे याद नहीं आ रहे ) तक सबको पढ्ता हूँ/ मतलब लुगदी साहित्य से ले के कालजयी रचनाओं तक सब कुछ/ हमने कहा फ़िर तो आप वर्णमाला और आरतियाँ भी पढ़ सकते हैं क्योंकि आपको तो समय काटने के लिये पढ़ना है या फ़िर पढ़ने के लिये पढ़ना है/ मैं सोच रहा हूँ कि आदमी को अगर पता ही न हो कि उसे क्या पढ़ना है, उसे पता ही न हो कि क्या पढ़ना चाहिये और क्या नहीं तो उस व्यक्ति का दिमाग तो एक कूड़ेदान सरीखा नहीं हो गया कि जिसमें हर घर से कुछ न कुछ मटेरियल सुबह सुबह डाल दिया जाता है/
आइला
कहाँ की बात चल रही थी कहाँ आ गई?
मुद्दा ये बात रही कि लोगों को हम पर कभी कभी शक़ हो जाता है कि हमारा किताबों से नाता रहता है/ और इसी उलझन में पूछ बैठते हैं कि “भाई क्या पढ़ रह हो” यहाँ भैंस चारा खाए कि दूध की गुणवत्ता पर सेमिनार में भाग लेने जाए?
मगर हमारे दोस्त शर्मिन्दा न हों इसलिये हम मज़बूरन बता देते हैं कि भाई अमुक किताब पढ़ रहे हैं/
कुछ दिन हुए एक सज्जन मिले एक वर्कशॉप में उन्होंने भी कुछ ऐसा ही प्रसंग छेड़ दिया ..संयोग से उस समय कोई पुस्तक हम पढ़ रहे होंगे// हमने पुस्तक का नाम बता दिया//
उन्होंने हमारी तरफ़ ऐसे देखा मानो हमने किताब का नाम नहीं बताया हो बल्कि मीटिंग रूम का गिलास बैग में डालते वक़्त पकड़े गए हों/
कहने लगे यार नया क्या पढ़ रहे हो? कन्टेम्परेरी क्या पढ़ रहे हो?
हमने उद्दंडता से जवाब दिया यार ये क्या कण्टेम्परेरी नहीं है? और अगर नहीं है तो उससे क्या मुझे पसन्द है/
उनको शायद मेरी बालहठ पर और मेरी नादानी पर तरस आया होगा इसीलिए कृपापूर्ण निगाहों से देखते रहे/
फ़िर उन्होंने कहा “यार तुम कायदे का क्या पढ़ रहे हो/”
मैने मन में सोचा अगर मेरी बताई हुई किताब के लेखक यह बात सुन लें तो बेचारे लिखना बन्द कर दें और मोबाइल रिचार्ज की दुकान खोल लें/
“कायदे की ही तो है यार ये किताब..” मैने प्रतिवाद में कहा/
“नहीं मेरा मतलब इंगलिश में कुछ नहीं पढ़ते हो?”
हमने कहा “हाँ पढ़ते तो हैं अखबार वगैरह देख लेते हैं अपने विषयों या काम से सम्बन्धित लेख रिपोर्ट्स वगैरह पढ़ते हैं इंगलिश में”
मैने सज्जन के चेहरे पर उभरते मनोबावों से ये अर्थ निकाला कि उनका चेहरा का एक एक अंश कह रहा है कि धिक्कार है तुमपे हिन्दी पढ़ते हो .. अंग्रेज़ी नहीं पढ़ते हो फ़िर क्या ख़ाक पढ़ा तुमने /”
मै बेशर्म वहाँ से खिसक लिया, बुद्धिजीवी सज्जन दुखी हो गये थे/
भाई ऐसा हो गया है इन दिनों कि लोग एक दूसरे को बताते हैं देखो हम ये पढ़ रहे हैं तुमने पढ़ा है कभी इसे?( अरे देखा भी है?)
कभी कभी मैं सोचता हूँ कि हम पढ़ने के लिये पढ़ते हैं या दूसरे को दिखाने के लिये?
हम ज़्याँ पाल सार्त्र पढ़ रहे हैं, हम कृष्णमूर्ति को पढ़ रहे हैं, हम इन्डियन फ़िलोसोफ़ी वाली बुक श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ रहे है अंग्रेज़ी ट्रान्सलेशन है बाबू, हम मार्केटिग की बेस्ट्सेलर पढ़ रहे हैं, हम सिडनी शेल्डन पढ़ रहे हैं, हम नैन्सी फ़्राईडे पढ़ रहे हैं….
लोग शायद ही हिन्दी पढ़ रहे हैं या हो सकता है पढ़ते हों मगर छुपाते हों कि दूसरा सुनेगा तो क्या सोचेगा देखो अभी भी हिन्दी पढ़ता है पूअर चैप.
किताबों की जो दुकानें बड़े बड़े मॉल्स में खुली हैं वहाँ किताबें खरीदना एक कॊस्टली अफ़ेयर बना दिया गया है शायद लग्ज़री से जोड़ के और इसलिये किताब का कथ्य नहीं उसका नाम बिकता है और लेखक का नाम बिकता है/ लग्जरी वाली किताबों की दुकानें हिन्दी जैसी गरीब और दरिद्र भाषा का माल नहीं रखतीं/ उनके कस्ट्मर ऐसे है ही नहीं/
ऐसा भी होता है कि किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने सोचा हो कि पढ़ने का झंझट बहुत है मगर बुद्धिजीवी तो बनना है..क्या किया जाए? ऐसा करते हैं कि किताबों के ढेर खरीद लेते हैं/
बहुत से कस्ट्मर किताब खरीदने नहीं आते अपने लिये बौद्धिक होने का तमगा खरीदने का भुगतान किस्तों में करने आते हैं/ ऐसा सिर्फ़ किसी भाषा तक सीमित हो ऐसा नहीं है/
मैने महसूस किया है कि आजकल उच्च शिक्षित वर्गे में हिन्दी में पढ़ने को पढ़ना नहीं समझा जा रहा/ जब आपसे प्रश्न पूछा जाता है कि क्या पढ़ रहे हो तब उम्मीद ये की जाती है कि आप किसी धुआँधार किस्म के बड़े से अंग्रेज़ी लेखक का नाम बताएंगे या किसी बेस्टसेलर किताब का नाम…जब मेरे जैसे लोग दोनों कसौटियों पर खरे नहीं उतरते तब उनके विश्वास को बड़ी चोट लगती है, शायद वे सोचने लगते हैं कि अरे अंग्रेज़ी किताबों के बाहर भी कोई पढ़ता लिखता है?

3 Comments

  1. Pratik Pandey said,

    May 5, 2007 at 9:38 am

    वाह! बहुत खूब। बिल्कुल सही बात कही है आपने। आजकल कई लोग उसी तरह केवल पढ़ने के लिए पढ़ते हैं, जिस तरह बहुतेरे नि:स्वार्थ लोग सिर्फ़ भलाई करने के लिए भलाई करते हैं।

    वैसे, आजकल मैं भी कृष्णमूर्ति को पढ़ रहा हूँ। :)

  2. Nitin Bagla said,

    May 5, 2007 at 11:37 am

    भास्कर, वेद प्रकाश शर्मा नही, सुरेन्द्र मोहन पाठक, हिन्दी में ही लिखते हैं… :)

  3. bhaskar said,

    May 9, 2007 at 5:34 am

    shukriya tippani ke liye…dosto…lagta he hamare blog pe santo ke charan padne lage he…

Post a Comment