May 28, 2007 at 5:40 am (विवक्षा)

प्रश्न रह जाते हैं अनुत्तरित ही
जो मैने पूछे थे तुमसे
जिनका जवाब मैं जानना चाहता था तुमसे बिना किसी लाग-लपेट के
या तुम मुझसे/
बिना मिश्री की डली में लिपटे
नीम की निबौरी की तरह जिनका हो स्वाद
उन सब सवालों पर पूछते ही पाश बाँध दिये जाते हैं
तर्क के भाषा के, और व्यंजना के
प्रश्न के ढाँचे पर होने लगती है बौद्धिक समीक्षा और बहसें/
ये पूछा सही पूछा मगर ऐसे क्यूँ वैसे क्यूँ?
प्रतिप्रश्न शुरू होते हैं मन्तव्यों पर?
किसने चढ़ाया था तुम्हें पूछने को प्रश्न?
किससे प्ररित थे सवाल?
सवाल इतना ही क्यों उतना क्यों नहीं?
सवाल में पात्र अमुक अमुक ही क्यों फ़लाँ फ़लाँ क्यों नहीं?
और असल बात कहो क्या थे हित निहित सवालकर्ता के?
ढेर ढेर वैचारिक तर्काभासों और उलझनों में सिकुड़ जाते हैं सवाल/
हम फ़िर उलझ जाते हैं बेसिरे की अन्तहीन बहसों में और
और असल चीज़ रह जाती है फ़िर से बेजवाब..
या ऐसे तो नहीं कहीं कि जवाब हो ही नहीं हमारे पास
और ये सिर्फ़ एक तरीका हो सवाल के तरीके पे उलझा के बच निकलने का/

Permalink 3 Comments

बाइ कास्ट क्या हैं आप?

May 26, 2007 at 4:14 am (कुछ इधर की कुछ उधर की)

कुछ दिन हुए केरल के एक प्रख्यात मन्दिर में एक केन्द्रीय मन्त्री के आगमन के उपरान्त मन्दिर को धोया गया पवित्र किया गया/ तर्क यह दिया गया कि चूँकि मन्त्री महोदय की पत्नी ईसाई हैं इसलिए वे और उनकी सन्तानें अपवित्र हैं/ मन्त्री महोदय ने बाद में कहा कि इस प्रकार से तो मेरी सन्तानें और वन्शज कभी किसी मन्दिर में जा ही नहीं पाएंगे/

ऐसी कोई पहली घटना हो ऐसा नहीं है इसके पहले भी कई बार इस प्रकार की घटनाएँ विशेषकर दक्षिण भारत के मन्दिरों में हुई हैं/ एक तरफ़ तो हिन्दू धर्म अपने को विस्तृत और उदार होने का दावा करता है और वास्तव में ऐसा बहुत हद तक है भी कम से कम उपनिषद्‌ और वेद तो ऐसा कहते ही हैं और दूसरी तरफ़ जब आचार क्रिया की बात आती है तब बिल्कुल उल्टा हो जाता है/ ब्रहम सत्यं जगन्मिथ्या का नारा बुलन्द करने वाले लोग खूब माया जोड़ने में लगे रहते हैं/

बहरहाल ऐसी घटनाओं के बाद किसी आदमी का स्वाभिमान शायद उसे विवश करेगा कि वो अपना धर्म बदल ले/ तब फ़िर हिन्दुत्व के ध्वजवाहक खूब शोर मचाएंगे/ हम धर्मान्तरण पर तो खूब बहस करते हैं और हल्ला करते हैं मगर उन दलितों और जनजातीय लोगों के लिए मन्दिरों के दरवाज़े खोलने में अब भी आनाकानी करते हैं, जो सैकड़ों सालों से हिन्दू धर्म की ध्वजा घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में फ़हराते चले आ रहे हैं/ कभी कभी मैं सोचता हूँ कि अगर ईसाई मिशनरी दवाई की गोलियाँ बाँटकर लोगों को क्रिश्चियन बना लेते हैं तो उसमें क्या बुराई है/ हमने तो उन्हें इतनी भी सहूलियत मुहैया नहीं कराई/

हालाँकि मैं जानता हूँ धोखे से या बलात धर्मान्तरण निश्चित रूप से कोई श्लाघ्य कर्म नहीं है मगर क्या हिन्दू धर्म में बने रहने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन्हीं की या फ़िर धर्मध्वजियों और विद्वानों की भी है/ हमने सिर्फ़ जाति विशेष को वन्चित रखा हो ऐसा नहीं है/ आबादी की आधी हिस्से महिलाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ है/ उज्जैन के महाकालेश्वर की भस्म आरती में महिलाओं को शामिल होने की अनुमति नहीं है/ कई सारे देवी देवता ऐसे हैं जो महिलाओं के छूने से अपवित्र हो जाते हैं फ़िर दलित और गैर हिन्दुओं की बात ही क्या/ ज़रा हिन्दू धर्म की पुनुरुत्थान वाले भाई लोग बताएंगे क्या कि आखिर कौन सा एजेन्डा हिन्दुत्व का पुनुरुत्थान कर सकता है?

हम यह तो चाहते हैं कि सब हिन्दू धर्म का सम्मान करें इसमें कोई आपत्ति है भी नहीं मगर जब भी सड़े-गले मवाद को कोई मसकता है तो बहुतों को दर्द होता है/ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने अपने प्रख्यात पुस्तक “कबीर” में लिखा है कि हिन्दुओं पर जब निरन्तर आक्रमण होते रहे तब उन्होंने अपने आप को एक सीमित दायरे में संकुचित रखने को अपना धर्म मान लिया/ इस की वजह यह रही कि उनके पास शायद उस समय और कोई विकल्प रहे ही नहीं होंगे/ मुझे छुओ मत वाली नीति अपना के रखने के सामाजिक और आर्थिक परिणाम अभी तक भुगतने पड़ रहे हैं/

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी भी अपने प्रख्यात निबन्ध “कछुआ धर्म” में यही बात कहते हैं कि हमारा धर्म कछुए के समान है जरा कुच हुआ नहीं कि खोल में सरक गए फ़िर जै राम जी की दुनिया में कुछ हुआ करे/ अपन ब्रह्म और माया के चिन्तन में व्यस्त/

मुझे प्रायः ऐसा लगता है कि हमारे धर्म में ढोंग बहुत है/ अब भई कोई मुझे लाठी ले के न दौड़ पड़ना कि तुमने हिन्दू धर्म के बारे में ऐसा कहने की हिम्मत कैसे की/ दूसरे धर्म के बारे में कह के बताते हिम्मत है तो/

तो उन लोगों का जवाब किसी दिन विस्तार से लिखूँगा अभी इतना कह दूँ कि जिस धर्म को मैने देखा समझा और जाना है उसी के बारे में तो लिख सकता हूँ/ आदमी अपने परिवार के बारे में ही लिख सकता है न कि पड़ोसियों के बारे में/ ढोंग इस मायने में कि पानी छान के पीने वाले लोग बेईमानी करने में ज़रा कोताही नहीं करते /गरीब को पटखनी देते रहने में हम ज़रा भी कमी नहीं करते/ ऐसे एकाध नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं जिन पर विस्तृत चर्चा की जा सकती है/

उपनिषद्‌ तो कहते हैं त्वं हि स्त्री त्वं हि पुमो॓ऽसि यानि कि तुम ही स्त्रि हो और तुम ही पुरुष/ आदि शंकराचार्य महाराज भी ऐसा ही कुछ कहते हैं अपने निर्वाण षटक्‌ में- “मनोऽबुद्धिऽहंकार चित्तानि नाहम्‌ चिदानन्द रूपं शिवोऽहम्‌ शिवोऽहम्‌” इसी में आगे कहा गया है कि “न मे राग द्वेषो न मे जाति भेदः” न मुझे राग है न द्वेष न जातिभेद/ मगर हम करेंगे ऐसा ही कि जब ट्रेन में कोई आदमी मिलता है तो उससे पूचे बिना रहा ही नहीं जाता कि भाई कौन ठाकुर हो या थोड़ा पढा लिखा आदमी हुआ तो पूछता है “बाइ कास्ट क्या हैं आप?” ये काल्पनिक उदाहरण सुने सुनाये नहीं दे रहा हूं बल्कि ये सब घटित हुए हैं मेरे साथ/ हममें से बहुतॊ ने इस अनुभव को सहा होगा/

यहाँ कोई दलित विमर्श का नाटक अपन नहीं करने जा रहे/ सीधी बात सीधे लफ़्ज़ों में/ अभी कुछ दिन पहले मैं एक टूर पर था तो साथ के सज्जन ने आखिर कार पूछ ही लिया आप बाइ कास्ट क्या हैं? हो सकता है ये प्रश्न शायद यु.पी.एस.सी. के पेपर में आने वाला हो और उनका कोई दूसरा मन्तव्य न रहा हो/ मगर मैं ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में बड़ा अचकचाता हूँ इसलिये नहीं कि मैं किसी कथित नीची या ऊँची जाति से ताल्लुक रखता हूँ बल्कि इसलिए कि यह प्रश्न बहुत ही भौंडा मुझे लगता है/

खैर यह हमारी कथनी और करनी का अन्तर है/ इसमें ज़्यादा क्या बोलूँ/ हमारे इलाकों में आज भी चमार-भंगी एक गाली के तौर पर इस्तेमाल होती आ रही है हमारे सामाजिक परिवेश में? एक घटना याद आ रही है/ हुआ यूँ कि मेरे ओफ़िस के कम्प्यूटर ऑपरेटर से कुछ बात चलते चलते बात जाति के मुद्दों पर आगई/ उसने कहा कि हमारे पूर्वज जो नियम बना गये वे बेवकूफ़ थोड़े ही थे/ हमको उन नियमों को बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए/ यह तर्क प्रायः वे सब लोग दिया करते हैं जिनके पास खुद के विचार नहीं होते/ मेरे द्वारा इस तर्क का प्रतितर्क दिये जाने पर उसने कहा सर आप कौन सी कास्ट के हैं तब मैं आपसे और ज़्यादा इस मुद्दे पर चर्चा कर सकता हूँ? मैंने कहा फ़िर हमें इस मुद्दे पर चर्चा बन्द कर देनी चाहिए/

बहुत बार लोगों को मैने यह भी कहते सुना है कि हम तो कोई फ़रक नहीं करते मानो उन्हें फ़र्क करने का ईश्वर-प्रदत्त अधिकार प्राप्त हो और इस अधिकार का इस्तेमाल न करके वे कोई एहसान कर रहे हों/ ौनको ऐसा कहते कई बार सुना है कि हम तो दलितों के साथ बैठ के खाना खा लेते हैं/ कुछ लोग बड़े गर्व के साथ ये भी कह्ते हैं कि हमारे घर में अगर पता चल जाए कि हम चमार के साथ बैठे थे तो हमको घर वाले नहलवा दें / इन सब बयानों और बातों में जो underlying assumption है वो ये कि हम दलित के साथ खाना खा के उनपर एहसान कर रहे हैं/ उन पर उपकार कर रहे हैं/ बहरहाल हिन्दुओं ही नहीं तमाम दूसरे धर्म वालों के सामने भी कमोबेश यह जाति प्रथा की समस्या है/ मगर हमारे हिन्दू धर्म में यह कुछ ज़्यादा ही भयावह है/

सवाल ये है क्या एक जातिविहीन समाज का सपना साकार करना सम्भव है? क्या जाति हमारे सामाजिक परिवेश में एक निल फ़ैक्टर बनाई जा सकती है?

Permalink 8 Comments

चिन्ता की चिन्ता

May 23, 2007 at 12:01 pm (विवक्षा)

मेरा पसन्दीदा काम है तरह तरह के मुद्दों पर चिन्ता व्यक्त करना.. इससे और कुछ हो न हो महानता का आभास ज़रूर होता है और समाज के लिए कुछ कुछ करने की फ़ोकटिया सन्तुष्टि भी मिलती है/

अलग अलग समय अलग अलग प्रकार की चिन्ताओं के लिए नियत हैं जैसे सुबह कूड़े से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण पर और दोपहर राजनीतिक चिन्ताओं देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार आदि आदि सार्वभौमिक और सर्वकालिक चिन्ताओं के लिए नियत हैं/ एक और पसन्दीदा विषय है ग्लोबलीकरण और प्राइवेटीकरण से बढ़ता असन्तुलन (यह चिन्ता तब ज़्यादा करता हूँ जब किसी मॉल में शॉपिंग करने जाता हूँ)/ दोस्त कहते हैं नए कपड़े और पर्फ़्यूम्स लेते वक़्त ये चिन्ता आपके चेहरे पर खूब छजती है/

चिन्ता कर देने के बाद उस विषय को एक छींके पे टाँग देता हूँ ताकि वक्त ज़रूरत पे काम आए/ वैसे इस से मेरा फ़ायदा बहुत हुआ है/ कॉलेज में जब हम पढ़ते थे तो मौके-बेमौके चिन्ता प्रदर्शन की वजह से ही हमको भाषण-वाद विवाद किस्म के निहायत बोर(श्रोताओं के लिए) कामों में कालेज का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेज दिया जाता था/ मन्च पर भी इसने मेरा साथ खूब निभाया/ अगर मेरे पास विपक्षी को प्रतिरोध के तर्क नहीं होते तो मैं कह दिया करता था कि मेरी भी चिन्ता है यही है वगेरह वगेरह (चित भी मेरी पट भी मेरी) इससे क्या होता था कि दोनों तरफ़ के मुद्दों पर चिन्ता व्यक्त कर दिया करता था और दोनों तरफ़ के तर्कों का इस्तेमाल कर लिया करता था/ ये दो नाव पर सवारी या कम से कम छूते हुए चलने का काम बड़ा फ़ायदेमन्द होता है/ प्रबन्धन की पढ़ाई के दौरान हमारे एक प्रोफ़ेसर साब जब भी लड़कों के जाल में फ़सते तो हमेशा कहने लगते थे “its not ‘either-or’ its ‘and-also’.”और हम उनके बौद्धिक आतंक से पीड़ित छात्र गदगद मुद्रा में आ जाते थे /
वैसे ये सिर्फ़ मेरा नहीं बल्कि ज़्यादातर महानुभावों और बौद्धिकों का काम है. बहुत बार ऐसा होता है कि चिन्ता न करो तो ऐसा लगता है कुछ खास काम अधूरा छूट गया..ईमानदारी से कहूँ तो ऐसा लगता है कि कब्ज़ की बीमारी की वजह से नित्यकर्म ठीक नहीं हुआ इस तरह का मुँह बन जाता है..

चिन्ता करने का सबसे बड़ा पहलू यह है कि जो आप सोचना चाह रहे है या जैसा सोचते हुए दिखना चाहते हैं उस तरीके की शक्लें आपको बनानी आनी चाहिए वरना यह काम गैर ज़िम्मेदाराना चिन्तन की केटेगरी में आ जाता है.. दूसरा महत्वपूर्ण फ़ैक्टर है कि आप को सिर्फ़ चिन्ता व्यक्त करनी है उन मुद्दों का समाधान कतई नहीं प्रस्तुत करना यहाँ तक कि उस दिशा में सोचने की भी मनाही है.. अगर आप समाधान करने पे उतारू हो गये तो फ़िर दूसरे दिन चिन्ता किस बात पर होगी? इसके अलावा एक चीज़ और है कि आप को विभिन्न मुद्दों पर चिन्ता व्यक्त करनी है उन मुद्दो से आपका सहमत असहमत होना एक्दम अलग चीज़ है..बिना किसी तरह की राय बनाए हुए आपको निष्पक्ष भाव से चिन्तित होते रहना चाहिए/

आप देश में बढ़ती हुई महगाई पर भी चिन्तित हो सकते है और देश की बढ़ती हुई विकास दर पर भी/ आप किसानों की आत्महत्या पर एक समय में चिन्तित हो सकते है और आपके शहर में मॉल के न होने पर उतनी ही सहजता से चिन्तित हो सकते हैं/ शहर में बढ़ रही कुत्तों की आबादी से रैबीज़ के खतरे पर शाम को चिन्ता व्यक्त की जा सकती है और सुबह उनके मारने से उत्पन्न होने वाली जैव-विविधता के संकट पर/.. कुल जमा बात ये कि चिन्तित होने के लिए कोई भी मुद्दा हो सकता है/ और याद रखिए कि ये मुद्दे ज़रूरी नहीं कि आपस में संबन्धित हों/
शाम को जब मैं सोता हूँ तो इस तरह का भाव चेहरे पर बार -बार आ जाता है कि हे मूढ़ समाज, ऐ एहसानफ़रामोश मुल्क़ ज़रा देखो तो सही मैने तेरे लिये इतनी चिन्ता की/ पूरा दिन दिन भर अपनी चिन्ताओं से दूसरों को अवगत कराता रहा/ लेकिन मुझे क्या मिला? मेरे घर में ए.सी.तक नहीं लगवाया तुम लोगों ने/ फ़िर मैं अपने कोटे की आखिरी चिन्ता करने के बाद टिटहरी जैसे टाँग उठा के सो जाता हूँ और सोते सोते सोचता हूँ कि देखो अच्छा हुआ आज इतनी चिन्ता कर ली वरना दुनिया का क्या होता?

Permalink 8 Comments

लोकभाषाओं के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न

May 10, 2007 at 8:56 am (विवक्षा)

भाषा सम्बन्धी चिन्ता और चिन्तन आजकल एक पुरातन सोच का प्रतीक है..ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में इस प्रकार की चर्चा गैर-सामयिक और अप्रासंगिक मानी जा रही है/ नहीं जानता कि क्यूँ?

भाषा सम्बन्धी चिन्ताओं से किसी को अवगत कराओ तो वे कहते हैं क्या गैर प्रोडक्टिव सोचते रहते हो..कोई कहता है यार आज मार्केट इतना चढ़ गया तुमको भाषा की चिन्ता सता रही है/

ये चिन्ताएँ काफ़ी बार व्यक्त की गई है और कतिपय बार इसका संज्ञान भी लिया गया है/ मगर समस्या यह है कि यह खबर न तो फ़ौरी तौर पर सरसरी पैदा करती है न ही कोई जिज्ञासुकीय उत्तेजना का महौल बनाती है/ सब कुछ ठीक चलता रहता है सिवाय इस डर के कि अगर हम शतायु हुए तो शायद अपनी भाषाओं में बात करने के लिये भी तरस जाएं..

खबर ये है कि दुनियाँ की आधी से ज़्यादा भाषाएँ अगले १०० सालों में लुप्त हो जाएंगी/ हालाँकि यह ऐसा पहला समाचार नहीं है…इसके पहले भी कई बार इसके मुतल्लिक़ खबरें शाया हो चुकी हैं/ यूनाइटेड नेशन्स ने भी अपना एक वर्ष भाषाओं को समर्पित किया था/ मगर इतनी बड़ी संस्था के अपना पूरा एक साल दे देने के बावज़ूद कम्बख्त भाषाओं की दरिद्रता में कोई परिवर्तन हुआ नहीं.

बहरहाल इस लेख के मूल में चिन्ता का मुद्दा ये तो नही ही है कि हिन्दी बचेगी या नहीं (जैसा कि प्रायः लोग सोचने लगते हैं, जब भी भाषा सम्बन्धी चर्चाएँ शुरू होती हैं) मेरा पुरा विश्वास है और यह विश्वास भावुकता पर नहीं बल्कि खरे आँकड़ों पर आधारित है, कि हिन्दी न सिर्फ़ बचेगी बल्कि बढ़ेगी भी/

इस खबर में जो महत्वपूर्ण बात है वह ये कि खतरे का इंगित सिर्फ़ बहुत छोटी भाषाएँ ही नहीं बल्कि विशालतर पैमाने पर फ़ैली हुई भाषाएँ भी हैं जिनका क्षेत्र घटने की सम्भाव्यता व्यक्त की गई है/ बहरहाल मैं समझता हूँ कि फ़िक़्र का सबसे बड़ा सबब ये है कि हमारी बोलियाँ बचेंगी या नहीं यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं था उस समाचार में कि उन्होंने बोलियों को (परिभाषानुसार जिनकी खुद की लिपि न हो बल्कि वे सिर्फ़ बोली जातीं हों) भाषा माना है या नहीं, अन्यथा आँकड़े और डरावने हो सकते हैं/

भाषा की वाचिक परम्परा एक सामाजिक ही नहीं बल्कि आर्थिक क्रियोत्पाद (फ़ंक्शन) भी है/ इसको एक छोटे उदाहरण से स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ – जब तक व्यक्ति अपने खेत खलिहान से जुड़ा होता है, उच्चतर परिधियों में नहीं आता है, वह अपनी लोकभाषा या बोली बोलता है/ जैसे ही उसका अपग्रेडेशन होता है आर्थिक स्तर वह सामाजिक स्तर में भी उत्तरोत्तर प्रगति करता है और क्रमिक ढंग से अपने से श्रेष्ठतर समझे जाने वाले समुदाय की भाषा, संस्कृति, कला, रीति-रिवाज़ सब में उच्चतर समुदायों का अनुसरण करने का प्रयास शुरू कर देता है/

भाषिक परिवर्तन और बोली के भाषा में संक्रमण की शुरुआत यहीं से होती है/ वह व्यक्ति और समुदाय अपने से बेहतर वर्ग की भाषा (उदाहरण के लिए हिन्दी) बोलना (खड़ी बोली) शुरू कर देता है/ यह जो अपग्रेडेशन का स्तर है जब वह और बढ़ता है तो क्रमशः वह आदमी अंग्रेज़ी बोलना शुरू करता है/ यह एक सामान्य उदाहरण है कि आय के बढने के साथ ही व्यक्ति अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालय में पढ़ाना चाहता है और उसके मुंह से “ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार” की पोयम सुनना चाहता है/

किसी भाषा को श्रेष्ठता के स्तर के साथ कैसे जोड़ा जाता है या यूं कहें कि कैसे जुड़ जाती हैं इसके अपने ऐतिहासिक और सामाजिक-आर्थिक कारं होते हैं इन पर विस्तार से चर्चा कभी और/ इस विचार को ऐसे भी कहा जा सकता है कि “जैसे जैसे संस्कृतिकरण होता जाता है आदमी अपने पुराने चोले को हटा देना चाहता है और उस वर्ग की भाषा संस्कृति कला यहाँ तक कि विचारों को अपना लेना चाहता है जो उसे अपने से श्रेष्ठ वर्ग लगता है या दूसरे शब्दों में कहें तो प्रभु वर्ग/”

जैसा कि पहले ही मैने यह स्पष्ट किया कि यहाँ चिन्ता की बात यह नहीं है कि हिन्दी रहेगी या नहीं हालाँकि कोई अनन्त काल के लिए तो कोई भाषा नहीं रहती मगर चिन्ता का मुद्दा है बोलियों का बचना…क्योंकि जैसे ही आदमी शिक्षित होता है, आर्थिक समृद्धि प्राप्त करता है, वह अपनी बोली को बोलना छोड़्ने लगता है/

सांस्कृतिक प्रवाह में और समय की धारा में भाषाएँ आती जाती रहती हैं/ नई नई भाषाएं पुरानी भाषाओं का स्थान लेती रहती हैं/ यहाँ तक कि पाली और प्राकृत जैसी धार्मिक भाषाएँ भी अनन्त काल के लिए नहीं होतीं उन पर भी विलोप के खतरे मँडराए होंगे और उनका प्रचलन समाप्त हो गया होगा.. बदलते हुए सांस्कृतिक परिदृश्य में खतरे की घंटी लोकबोलियों के लिये है/ यह सांस्कृतिक परिदृश्य निश्चित रूप से आर्थिक और तकनीकी परिवर्तनों से प्रभावित होता ही है/ यदि बोलियों बोलने में, उनमें बतियाने में, सम्वाद स्थापित करने में यदि समुदायों को हीनभावना लगने लगे (अनजाने में ही सही) तो उन बोलियों का अस्तित्व कैसे टिक सकता है/ दुनियाँ की कोई भी बोली हो कोई भी मगर जन जीवन से जुड़े हुए और दैनन्दिन चर्या से जुड़े हुए शब्द जो आपको बोलियों में मिलेंगे वे उस बोली से सम्बद्ध कथित श्रेष्ठ भाषा में नहीं मिल सकते/ मैं यहाँ उ.प्र. और म.प्र. में बोली जाने वाली बोली बुन्देली का उदाहरण रखना चाहता हूँ/ खेत खलिहान और ज़मीनी अभिव्यक्ति से जुड़े हुए शब्द कुछ तो इसमें ऐसे हैं कि काफ़ी प्रयास के बावज़ूद मैं हिन्दी में उनके समानार्थी खोज नहीं सका/ मैं समझता हूँ कि ऐसा ही बाकी तमाम सारी बोलियों के साथ भी है/

बोलियों के साथ एक और चीज़ है कि वे ग्रामीण परिवेश के साथ समायोजित है और उस परिवेश के साथ ही बोलियों को एसोसिएट किया जाता है/ सामाजिक स्तरीकरण के चरण जैसे जैसे पार होते है, वैसे-वैसे व्यक्ति स्वयं को नगरीय सभ्यता के साथ जोड़ने का आकांक्षी होता है और ग्रामीण सभ्यता वाली पहचान से खुद को पृथकीकृत करना चाहता है/ इस ज़द्दोजहद में हानि होती है बोलियों की/

इस प्रकार के सामाजिक स्तरीकरण में सिर्फ़ बोलियों का नुकसान नहीं होता बल्कि यूं कहें कि तमाम सारी लोक-परम्पराओं विशेषकर ग्राम-सभ्यता की ओर खतरे का एक और क़दम सरक आता है/

बोलियाँ अपने साथ सिर्फ़ इतिहास गौरव नहीं लिये हुए हैं बल्कि संस्कृति का बहुत सारा सत्व और सामाजिक चिन्तन इनमें समाया हुआ है/ वाचिक परम्परा के तहत शामिल कथा, गीत और अन्य कलाएँ इसके अतिरिक्त हैं/ हालाँकि यह कहना बहुत मुश्किल है कि क्या बचेगा और क्या नहीं क्योंकि समय की आँधी में तमाम संस्कृतियाँ, बोलियाँ, भाषाएं यहाँ तक कि धर्म और पन्थ भी उड़ गए, मगर इस दफ़ा आँधी की रफ़्तार कुछ ज़्यादा ही तेज़ है/ भाषाओं के बनने बिगड़ने का क्रम चलता रहता है/ अनादिकाल से यह प्रवाह सभ्यता को गतिमान रखे हुए है मगर इसके पहले तक भाषाएं एक क्रम्बद्ध तरीके से उत्तरोत्तर विकसित और परिमार्जित होती रहीं/ कई सारी भाषाएँ संस्कृत से निकली और स्वतन्त्र रूप में भी उनका अस्तित्व रहा/ अब प्राकृत, अपभ्रंश, पाली, इत्यादि के ही कई सारे रूप हुआ करते थे जिनसे तमाम सारी बोलियों का विकास हुआ. मागध प्राकृत से मगधी का उद्भव हुआ तो शौरसेनी प्राकृत से बृज बोली का/ मगर इन भाषाओं का लोप नहीं हुआ बल्कि दूसरी बोलियों या भाषाओं में परिवर्तन और परिवर्धन होता रहा/

अभी स्थिति थोड़ी जुदा है/ खतरा यह है कि कुछ विशेष भाषाओं का ही अस्तित्व रह जाएगा और बाकी की निपट जाएंगी/ भाषा के बहुलवाद की समाप्ति का खतरा असली खतरा है/ हालाँकि भाषा के अनावश्यक शुद्धिकरणवादी पैरोकारों से मैं इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता मगर ये ज़रूरी तो है ही कि कम से कम किसी भाषा को शुद्ध रूप में जानने समझने वाले लोग बचे तो रहें/ यह बात बोलियों के सन्दर्भ में भी सत्य है/ मैने स्वयं अपनी बोली बुन्देली में नोटिस किया है कि ऐसे कई सारे शब्द हैं जो आज मेरी पीढ़ी को पता ही नहीं हैं या फ़िर उनका स्थान हिन्दी के शब्दों ने ले लिया है इसकी वजह ये भी हो सकती है कि अब वे शब्द अप्रासंगिक हो गए हैं या अनुपयुक्त/ यदि कोई वस्तु ही लोगों को देखने को न मिले तो उसकी संज्ञा शब्दों का संरक्षण कैसे किया जा सकता है? शब्दों का कोई प्रेज़र्वेशन कर के तो रखने का औचित्य है नहीं/ 

किसी भाषा का लोप होना सिर्फ़ उस भाषा का मरना नहीं है वरन्‌ एक सम्पूर्ण संस्कृति समुच्चय का अवसान होना है/

भाषा सम्बन्धी विमर्श को आगे बढ़ाते हुए इस में यह बिन्दु जोड़ना भी आवश्यक है भाषा का फलते फूलते रहना एक जीवन शैली का और वैचारिक समुत्पादों का, एक संस्कृति का बने रहना है/

इन सब तर्कों प्रतितर्कों और समझ के बावज़ूद यह सवाल हमारे सामने बना हुआ है कि बोलियों को कैसे बचाया जाए? और उसके पहले ये कि क्या वाकई बचाने की ज़रूरत है? और यदि हाँ तो कैसे? या फ़िर इस परिवर्तन की प्रक्रिया को जस का तस स्वीकार कर लिया जाए? बिना किसी ना-नुकर के/ कुल ज़मा बात ये कि क्या इस भाषाई क्षरण की गति को कुछ मन्दीकृत किया जा सकता है या कम से कम स्थिर किया जा सकता है? मैं उत्तर नहीं दे सकता क्योंकि जटिलीकृत होती जाती आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में उत्प्रेरक कारक न सिर्फ़ बहुत सारे हो गए हैं बल्कि उनके संयोजन भी अत्यधिक हैं/ भाषाओं का सवाल फ़िलहाल तो अनुत्तरित ही रखता हूँ हालाँकि जवाब शायद नकारात्मक हो जिसकी सम्भावना मुझे ज़्यादा लगती है/

Permalink 1 Comment

अच्छे रिटर्न वाले निवेश

May 9, 2007 at 5:28 am (कुछ इधर की कुछ उधर की)

अच्छी नौकरी लगने के बाद बहुत से लोगों के सामने समस्या ये आती है कि अब जो पैसा बच रहा है उसका क्या किया जाए? ये समस्या इस ब्लोग को पढ़ने वाले मेरे कई दोस्तों के सामने आ रही होगी/

एक तो रेडीमेड उपाय है कि बैंक में जमा कर के उसपर ब्याज खाते रहा जाए, मगर उसमें लोचा ये है कि जितने की आमदनी होती है उससे ज़्यादा टै़क्स देना पड़ जाता है मतलब जितने की भक्ति नहीं हुई उससे ज़्यादा के मँजीरे फूट जाते हैं/

कुछ जानकार लोग ये भी बताते हैं कि इन्वेस्टमेंट किया जाए/ इन्वेस्टमेंट का मतलब अलग अलग कंपनियों के शेअर में पैसा लगाना, म्यूचुअल फ़ंड में पैसा लगाना, और बीमा पॉलिसी खरीदना होता है/ मगर खरीदें तो किस कंपनी का ये समस्या है/ ज्ञानीजन इसका उत्तर देते हैं जिसका रिटर्न अच्छा हो उस कम्पनी में पैसा लगाना चाहिये/

इसी जोड़ घटाव में मैं आजकल परेशान हूँ कि कहाँ पैसा लगाया जाए/

वैसे मैंने कुछ बहुत दमदार रिटर्न देने वाली शेअर कम्पनियों और म्यूचअल फ़ंड की जानकारी इकट्ठी की है/ बिजनेस के इच्छुक लोगों की जानकारी के लिए यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ/

A. सबसे प्रमुख नाम है हिन्दुत्व & सन्स कम्पनी का- इसका हेड ऒफ़िस नागपुर में है और अन्य शाखाएं विभिन्न प्रदेशों की राजधानियों में हैं इस कम्पनी के बारे में खास बात ये है कि इसके रिटेल आउटलेट तमाम सारे कस्बों में मौज़ूद हैं जिन्हें शाखा के नाम से जाना जाता है हालाँकि इन आउटलेट्स से आजकल बिक्री थोड़ी सी डाउन है यहाँ अत्यन्त प्राचीन माल उपलब्ध रहता है जिसकी गुणवत्ता पर कोई सन्देह नहीं किया जा सकता/

वैसे तो ये कम्पनी काफ़ी पुरानी है मगर इसके शेअर होल्डर बनने क अधिकार सबको नहीं है/

इस कम्पनी ने समय समय पर अनेक म्यूचअल फ़ंड निकाले हैं जिनके नाम निम्नलिखित हैं

१. गौ-वन्श संरक्षण- यह इसका सबसे पुराना फ़ंड है जिसका रिटर्न बहुत ज़बर्दस्त तो नहीं रहा था मगर इससे कम्पनी को एक पहचान ज़रूर मिली थी/ अब भी पुराने व्यापारी लोग कभी कभी इस फ़ंड के शेअर बेचने की कोशिश यदा-कदा करते रहते हैं/

२. स्वदेशी फ़ंड- यह फ़ंड लोगों को बहुत पसन्द नहीं आया हालाँकि इस फ़ंड में कम्पनी ने कुछ अलग करने की कोशिश की थी मगर शेअर होल्डर्स का इस फ़ंड को अपनाने में नुकसान हो रह था इसलिए यह चला नहीं ज़्यादा/ बाद में रेगुलेटर्स ने इस फ़ंड की बिक्री लगभग खत्म करवा दी/

३. कम्पनी की ऎतिहासिक योजना है “मन्दिर पुनर्निर्माण योजना”- इस योजना ने वाकई लोगों की किस्मत बदल दी/

जिनको कोई उधार नहीं देता था, गाँव भर के लोगों ने उन्हें पूँजी के लिये चन्दे के रूप में चादर भर भर के पैसा दिया/ इस योजना के मेम्बर बन के कोई भी श्रद्धालु व्यापारी कई वर्षों तक निरन्तर लाभ प्राप्त कर सकते हैं हर विधानसभा चुनाव में इस योजना पर डिविडेण्ड दिया जाता है/ यह लाभ उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों में दोगुने से भी ज़्यादा हो सकता है/

यह योजना पहले काशी, मथुरा और अयोध्या के लिये लागू थी यानि कि वहाँ पर कम्पनी का अपनी फ़ैक्ट्री डालने का प्लान था मगर उपरोक्त योजना की अद्भुत सफ़लता को देखते हुए कम्पनी ने तय किया कि एक पूरी अलग कम्पनी “राम मन्दिर निर्मांण प्राइवेट लिमिटेड” के नाम से खोल दी जाए/ इस कम्पनी ने १९८८-८९ के दौरान गाँव-गाँव से पूँजी इकट्ठी की और कम्पनी का हेड ओफ़िस अयोध्या में बनाने की कोशिश की मगर वहाँ पर पहले से एक निजी कम्पनी कार्यरत थी जिसकी वजह से हाथा-पाई की नौबत आ गई/

इस नये उद्यम का डिविडेण्ड बहुत शानदार रहा और मालिकों की इसे खोलने की योजना पूरी तरह सफ़ल साबित हुई/ यहाँ तक कि इस कम्पनी के लाभांशों पर आयकर की छूट भी मिल गई/ इसके चूँकि ग्राहक बहुत ज़्यादा थे इस लिये यह तय किया गया कि इस स्कीम को सिर्फ़ चुनावों के समय ही जनता के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा बाकी समय दूसरे छोटे-छोटे फ़ंड उपलब्ध कराए जाएंगे/ इस योजना का पे-बैक समयावधि बहुत कम रही मतलब ये कि बहुत जल्दी रिटर्न मिलना शुरू हो गए/

अयोध्या-मन्दिर म्य़ूचुअल फ़ंड पहले एक बम्पर रिटर्न दे चुका है इस रिटर्न का लाभ ये हुआ कि उस समय जिसने भी इसके शेअर इफ़रात में खरीद लिये वे सब मन्त्री विधायक सांसद तक हो गये/ कुछ लोग केन्द्र में मन्त्री भी बने और अभी तक बन रहे हैं/

४. तुष्टिकरण विरोधी म्यूचअल बेनेफ़िट ट्रस्ट- यह ट्रस्ट बहुत ही नेक उद्देश्यों के साथ कम्पनी ने अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिये गठित किया है/ इसमें आप अलग अलग समय में अलग अलग प्लान खरीद सकते हैं/ इस ट्रस्ट के मुख्य ट्रस्टी एक पश्चिमी प्रदेश के मुख्यमन्त्री हैं जिनका काम इस ट्रस्ट के सामाजिक सोद्देश्यों को प्रचारित करना और उन्हें बढ़ावा देना है/

निरन्तर बढ़ती लोकप्रियता और जबर्दस्त बिजनेस के कारण कम्पनी को इस बाज़ार में प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा है/ यह प्रतियोगिता ठाकरे & सन्स की वजह से महाराष्ट्र में बढ़ गई है साथ ही कम्पनी के एक पूर्ववर्ती निदेशक ने अपनी अलग कम्पनी लाँच कर दी है/ इन सब कारणों के चलते अभी कुछ रिटर्न में कमी आई है/

कम्पनी नए उपायों के साथ शेअर होल्डर्स को रिझाने में लगी है साथ ही ये बता भी रही है कि “असली हिन्दुत्व सिर्फ़ हम बेचते हैं, इस शहर में हमारी कोई अन्य शाखा नहीं है, नक्कालों से सावधान” /

B. बाज़ार की सबसे पुरानी कम्पनी काँग्रेस & फ़ैमिली प्राइवेट लिमिटेड है यूँ तो इस कम्पनी ने लॊंग टर्म इन्वेस्टर्स को जबर्दस्त लाभांश दिये हैं मगर छोटी अवधि के निवेशकों के लिए इस कम्पनी में फ़िलहाल कोई आकर्षक योजना उपलब्ध नहीं है/

इस कम्पनी की खास बात ये है कि इसका निदेशक मंडल यानि बोर्ड ओफ़ डायरेक्टर्स हमेशा एक जुट रहता है सी.ई.ओ. के पीछे और सी.ई.ओ.  की पोस्ट एक ही व्यक्ति के पास आजन्म बनी रहती है/ यदि परिवार में कोई बच्चा पैदा होता है तो कम्पनी को आने वाले सत्तर साल तक नए सी.ई.ओ. की तलाश नही करनी पड़ती/ इस वजह से कम्पनी बाज़ार में स्थिरता की गारंटी का दावा करती है/ इस कम्पनी ने अब तक का सबसे शानदार प्रदर्शन किया है “गरीबी हटाओ-बम्पर रिटर्न योजना” में/ इस का रिटर्न वाकई बम्पर रहा था और इस रिटर्न के चलते कई सालों तक शेअर होल्डर्स को लाभांश बाँटे जाते रहे/ इस कम्पनी ने अपने टारगेट क्लाइंट के हिसाब से अलअग अलग उत्पाद मार्केट में उतारे हैं जिससे कि इसका पोर्ट्फ़ोलिओ विविधीकृत है/ इस की सबसे खास बात ये है कि यह कम्पनी तब अच्छा प्रदर्शन करती है जब उम्मीद बिल्कुल कम हो/

अभी मार्केट में ताज़ा फ़ंड इन्होंने उतारा है उसका नाम है “ओ.बी.सी. आरक्षण इन्सेन्टिव प्लान” इसके तहत कम्पनी अपना पब्लिक ऒफ़र देने जा रही है ताकि रिटर्न्स अगले चुनाव तक प्राप्त किये जा सकें मगर कुछ तकनीकी अड़ंगों के चलते यह प्लान ज़ोर की बिक्री पकड़ नहीं पा रहा है/ इसके अलावा स्थानीय स्तर पर कुछ छोटी कम्पनियाँ इस तरह के ऒफ़र के साथ पहले से ही तैयार बैठीं हैं/

C. इन दो मुख्य कम्पनियों के अतिरिक्त छोटे -छोटे योजनाओं वाली भी कुछ कम्पनियाँ है जिनका रिटर्न पिछले चुनाव वर्षों में ठीक-ठाक रहा है जैसे कि “दलित-वर्ग बेवकूफ़ बनाओ ट्रस्ट” -प्रायोजक मायावती&मायावती, मुस्लिम हिमायत शेअर होल्डर्स- मालिक मुलायमसिंह (असली समाजवादी)

D. इन सबके अतिरिक्त एक ऐतिहासिक IPO का उल्लेख किये बिना जानकारी अधूरी रह जाएगी/ दर-अस्ल अयोध्या मन्दिर म्यूचअल फ़ंड इस IPO को टक्कर देने के लिये ही उतारा गया था/ इस का नाम है “मंडल मिलेनियम मेगा ओफ़र” - इस ओफ़र में नया कुछ नहीं था बल्कि यह तो काफ़ी पहले एक बिजनेस प्रोसेस रि-एन्जिनीयरिंग की रिपोर्ट में पड़ा हुआ था/ मगर अचानक ही कम्पनी के सी.ई.ओ. की नज़र इस पर पड़ी जो कि कम्पनी के अन्दरूनी विद्रोहों से परेशान थे/ उनके इस प्रस्ताव को हाथ लगाते ही उनके स्वयं और इस प्रस्ताव, दोनों के दिन बदल गए/

कम्पनी हालाँकि बाद में दिवालिया हो गई मगर तगड़े रिटर्न देके गई/ इस कम्पनी से टूट के बनी कम्पनियाँ आज तक इस IPO की तर्ज़ पर मॊडल उतारते रहती हैं/

तो भाई आपके सामने ये सब कम्पनियाँ और उनके स्कीम्स हैं/ बस ये तय कीजिये कहाँ इन्वेस्ट करना है हर तरह का प्लान हाज़िर है/ 

Permalink 3 Comments

पगडंडी के रास्ते किताब

May 3, 2007 at 7:54 pm (कुछ इधर की कुछ उधर की)

 कभी कभी लोग पूछते हैं या बुद्धिजीवी किसिम के दोस्त ज़रूर पूछते हैं कि भाई भास्कर आजकल क्या पढ़ रहे हो? अब सामान्य तौर पर हम कुछ पढ़ते लिखते तो हैं नहीं मगर बुद्धिजीवी दोस्त पूछ के शर्मिन्दा न हो जाएँ इसलिये कुछ बताना लाज़िमी हो जाता है/ अगर हम कह दें कि भाई आजकल नौकरी से फ़ुर्सत मिल ही नहीं रही कि कुछ पढ़ें या यूँ कि शाम को आके हम खाना बनाने में व्यस्त हो जाते हैं इसलिये पढ नहीं पा रहे, तो जितनी शर्म हमें नहीं आएगी उससे ज़्यादा मेरे दोस्त को आएगी कि देखो तो साले को हमारा दोस्त होने का गौरव भी प्राप्त कर रहा है और कुछ पढ़ता ही नहीं है/
इस प्रकार के अप्रिय प्रसंगों से बचाने के लिए मैं कुछ न कुछ बता दिया करता हूँ..वैसे बहुत से भाइयों ने मुझे एक राज़ की बात बताई है आपसे भी शेअर कर सकता हूँ.. वो ये कि जो खाँटी बुद्धिजीवी बनना चाहे उसे पढ़ना अनिवार्य नहीं है/ बुद्धिजीवी लोग किताबें नहीं पढ़ते वे लोग लेखकों को पढ़ते हैं दर-असल वे माल नहीं खरीदते ब्रांड खरीद कर खुश हो रहे होते है/ एक तरीका और है उसे पगडंडी पढ़ाई कहते हैं/ पगडंडी पढ़ाई होती है जैसे हम लोग १०वॊईं १२वीं में पढ़ा करते थे/ मुख्य मुख्य प्रश्नों के उत्तर रट के चले जाते थे और एग्जामिनेशन हॉल में उल्टी कर के भाग आते थे/ बहुत से लोग पगडंडी जेब में रख के भी एग्जाम हाऑल चले आते थे/
इस तरीके के पढ़ाई का मुख्य सिद्धान्त है कि किताब का रिव्यू पढ़ लो/ आलोचना वाले विद्वान उस किताब की अच्छाई बुराई लिख ही देते हैं कण्टेण्ट के बारे में भी पता चल जाता है/
इसके बाद किताब से उद्धरण निकाल के २-४ कहीं नोट कर लो ताकि मौक़े बेमौक़े काम आ सकें/ बाकी बचता है काम लेखक का नाम पता याद रखने के तो वो आसानी से किया जा सकता है/
कभी कभी मैं उन लोगों की प्रतिभा से बहुत कुण्ठित महसूस करता हूँ जो एक बार मे ३-४ नोवेल, २-३ गैर-फ़न्तासी ग्रन्थ और ८-१० दीगरकिताबों का अध्ययन कर रहे होते हैं/ मैं सोचने लगता हूँ यार ऐसे ज़्यादा नहीं कुछ ३-४ हज़ार लोग हिन्दुस्तान में हो जाएं तो लेखकों की गरीबी और पाठकों का अभाव जैसी चिरन्तन समस्याएँ मिट जाए क्योंकि इन लोगों को एक ही समय में १५-२० किताबें पढ़ने की आदत होती है/
ये लोग असल में किताबों की पगडंडियों से गुज़र के पुस्तकों का रसास्वादन करते हैं/
एक दूसरा रास्ता है पम्फ़्लेट पुस्तक का गहन अध्ययन/ ये थोड़ा अलग तरह के पाठक होते हैं जो दुनियाँ के सब विषयों पर न सिर्फ़ कुछ न कुछ पढ़ चुके होते हैं बल्कि शायद ३-४ हज़ार विषयों पर उनकी डॉक्टरेट कम्प्लीट हो गई होती है/ ये सज्जन पम्फ्लेट को भी किताब का आदर देते हैं और उस पम्फ़्लेट को ही बाद में थोड़ा थोड़ा तानते खींचते किताब में बदल देते हैं/
आयुर्वेद की किसी दुकान का विज्ञापन भर पढ़ लेने से इनको आयुर्वेद के निघण्टुओं तक की जानकारी हो जाती है/
मेरे एक मित्र हैं वे सिर्फ़ पढ़ने के लिये पढ़ते हैं/ अच्छी बात है कुछ लोग खाने के लिये ही जीते हैं, ये पढ़ने के लिये जीते हैं/ वे कहते हैं कि मैं सब कुछ पढ्ता हूं वेद्प्रकाश शर्मा से ले के …….. (अंग्रेज़ी के कुछ बड़े नाम थे याद नहीं आ रहे ) तक सबको पढ्ता हूँ/ मतलब लुगदी साहित्य से ले के कालजयी रचनाओं तक सब कुछ/ हमने कहा फ़िर तो आप वर्णमाला और आरतियाँ भी पढ़ सकते हैं क्योंकि आपको तो समय काटने के लिये पढ़ना है या फ़िर पढ़ने के लिये पढ़ना है/ मैं सोच रहा हूँ कि आदमी को अगर पता ही न हो कि उसे क्या पढ़ना है, उसे पता ही न हो कि क्या पढ़ना चाहिये और क्या नहीं तो उस व्यक्ति का दिमाग तो एक कूड़ेदान सरीखा नहीं हो गया कि जिसमें हर घर से कुछ न कुछ मटेरियल सुबह सुबह डाल दिया जाता है/
आइला
कहाँ की बात चल रही थी कहाँ आ गई?
मुद्दा ये बात रही कि लोगों को हम पर कभी कभी शक़ हो जाता है कि हमारा किताबों से नाता रहता है/ और इसी उलझन में पूछ बैठते हैं कि “भाई क्या पढ़ रह हो” यहाँ भैंस चारा खाए कि दूध की गुणवत्ता पर सेमिनार में भाग लेने जाए?
मगर हमारे दोस्त शर्मिन्दा न हों इसलिये हम मज़बूरन बता देते हैं कि भाई अमुक किताब पढ़ रहे हैं/
कुछ दिन हुए एक सज्जन मिले एक वर्कशॉप में उन्होंने भी कुछ ऐसा ही प्रसंग छेड़ दिया ..संयोग से उस समय कोई पुस्तक हम पढ़ रहे होंगे// हमने पुस्तक का नाम बता दिया//
उन्होंने हमारी तरफ़ ऐसे देखा मानो हमने किताब का नाम नहीं बताया हो बल्कि मीटिंग रूम का गिलास बैग में डालते वक़्त पकड़े गए हों/
कहने लगे यार नया क्या पढ़ रहे हो? कन्टेम्परेरी क्या पढ़ रहे हो?
हमने उद्दंडता से जवाब दिया यार ये क्या कण्टेम्परेरी नहीं है? और अगर नहीं है तो उससे क्या मुझे पसन्द है/
उनको शायद मेरी बालहठ पर और मेरी नादानी पर तरस आया होगा इसीलिए कृपापूर्ण निगाहों से देखते रहे/
फ़िर उन्होंने कहा “यार तुम कायदे का क्या पढ़ रहे हो/”
मैने मन में सोचा अगर मेरी बताई हुई किताब के लेखक यह बात सुन लें तो बेचारे लिखना बन्द कर दें और मोबाइल रिचार्ज की दुकान खोल लें/
“कायदे की ही तो है यार ये किताब..” मैने प्रतिवाद में कहा/
“नहीं मेरा मतलब इंगलिश में कुछ नहीं पढ़ते हो?”
हमने कहा “हाँ पढ़ते तो हैं अखबार वगैरह देख लेते हैं अपने विषयों या काम से सम्बन्धित लेख रिपोर्ट्स वगैरह पढ़ते हैं इंगलिश में”
मैने सज्जन के चेहरे पर उभरते मनोबावों से ये अर्थ निकाला कि उनका चेहरा का एक एक अंश कह रहा है कि धिक्कार है तुमपे हिन्दी पढ़ते हो .. अंग्रेज़ी नहीं पढ़ते हो फ़िर क्या ख़ाक पढ़ा तुमने /”
मै बेशर्म वहाँ से खिसक लिया, बुद्धिजीवी सज्जन दुखी हो गये थे/
भाई ऐसा हो गया है इन दिनों कि लोग एक दूसरे को बताते हैं देखो हम ये पढ़ रहे हैं तुमने पढ़ा है कभी इसे?( अरे देखा भी है?)
कभी कभी मैं सोचता हूँ कि हम पढ़ने के लिये पढ़ते हैं या दूसरे को दिखाने के लिये?
हम ज़्याँ पाल सार्त्र पढ़ रहे हैं, हम कृष्णमूर्ति को पढ़ रहे हैं, हम इन्डियन फ़िलोसोफ़ी वाली बुक श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ रहे है अंग्रेज़ी ट्रान्सलेशन है बाबू, हम मार्केटिग की बेस्ट्सेलर पढ़ रहे हैं, हम सिडनी शेल्डन पढ़ रहे हैं, हम नैन्सी फ़्राईडे पढ़ रहे हैं….
लोग शायद ही हिन्दी पढ़ रहे हैं या हो सकता है पढ़ते हों मगर छुपाते हों कि दूसरा सुनेगा तो क्या सोचेगा देखो अभी भी हिन्दी पढ़ता है पूअर चैप.
किताबों की जो दुकानें बड़े बड़े मॉल्स में खुली हैं वहाँ किताबें खरीदना एक कॊस्टली अफ़ेयर बना दिया गया है शायद लग्ज़री से जोड़ के और इसलिये किताब का कथ्य नहीं उसका नाम बिकता है और लेखक का नाम बिकता है/ लग्जरी वाली किताबों की दुकानें हिन्दी जैसी गरीब और दरिद्र भाषा का माल नहीं रखतीं/ उनके कस्ट्मर ऐसे है ही नहीं/
ऐसा भी होता है कि किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने सोचा हो कि पढ़ने का झंझट बहुत है मगर बुद्धिजीवी तो बनना है..क्या किया जाए? ऐसा करते हैं कि किताबों के ढेर खरीद लेते हैं/
बहुत से कस्ट्मर किताब खरीदने नहीं आते अपने लिये बौद्धिक होने का तमगा खरीदने का भुगतान किस्तों में करने आते हैं/ ऐसा सिर्फ़ किसी भाषा तक सीमित हो ऐसा नहीं है/
मैने महसूस किया है कि आजकल उच्च शिक्षित वर्गे में हिन्दी में पढ़ने को पढ़ना नहीं समझा जा रहा/ जब आपसे प्रश्न पूछा जाता है कि क्या पढ़ रहे हो तब उम्मीद ये की जाती है कि आप किसी धुआँधार किस्म के बड़े से अंग्रेज़ी लेखक का नाम बताएंगे या किसी बेस्टसेलर किताब का नाम…जब मेरे जैसे लोग दोनों कसौटियों पर खरे नहीं उतरते तब उनके विश्वास को बड़ी चोट लगती है, शायद वे सोचने लगते हैं कि अरे अंग्रेज़ी किताबों के बाहर भी कोई पढ़ता लिखता है?

Permalink 3 Comments