किसान की मौत का मर्सिया
आज की तीन खबरें ऐसी है जिनपर बिना कहे और लिखे रहा नहीं जा सकता I
पहली खबर यह कि उरई जिले में एक किसान ने आत्महत्या कर ली क्योंकि उसकी फ़सल खराब हो गई थी और उस पर सूखा और फ़िर ओलावृष्टि ने काम तबाह कर दियाI इस दौर में जब शेअर मार्केट के उतार चढ़ाव और शिल्पा शेट्टी के चुम्बन समाचारों की सुर्खियों में छाए रहते हैं किसानों की आत्महत्या और दिनोंदिन बिगड़ती जाती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुध लेने में किसी की दिलचस्पी नहीं हैI कितनी अज़ीब बात है कि अगर वोट बैंक की नज़र से देखें तो भी किसान किसी जाति या धर्म विशेष से अधिक ही हैसियत रखते हैंI मगर उनकी समस्याओं की तरफ़ किसी की तवज़्ज़ो नहीं हैI कहीं यह इसलिए तो नहीं कि किसान संगठन का अभाव है या फ़िर वे बड़े औद्योगिक घरानों की तरह राजनीतिकों को आर्थिक सहायता नहीं करते/ दर-असल छोटे और मध्यम किसानों की सम्स्याएं न तो समझी जा रही हैं न ही उन पर कोई कारगर उपाय किए जा रहे हैंI
ज्ञानेन्द्रपति अपनी एक कविता में कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त करते प्रतीत होते हैं जब वे देसी बीजों की तुलना मोन्सेन्टो के संकर बीज़ों के साथ करते हैं I कृषि लगातार पिछड़ रही है मगर उस पर सरकारें कोई योजना कोई आयोग तक बनाने की ज़हमत नहीं कर रहीं I ऐसा क्यों? स्वयम्भू कृषक नेता शरद पवार जैसे लोग क्रिकेट के खेल में व्यस्त हैं उड्डयन मन्त्री प्रफ़ुल्ल पटेल के इलाके विदर्भ में आत्महत्याएं हो रही हैंI मेरा मानना है कि किसान की आत्महत्या कोई खबर नहीं है न ही चिन्ता की बात….मुद्दा ये है कि उन परिस्थितिजन्य जड़ता को तोड़ने के लिए क्या किया जा रहा है जिसका प्रतिफ़ल इन आत्महत्याओं में नज़र आता हैI
ऐसा नहीं है कि किसान आन्दोलन हुए नहीं इस देश मेंI आज़ादी के पहले ही स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने किसानों को एकजुट करके आन्दोलन खड़ा किया थाI बंगाल का तेभागा आन्दोलन (१९५० के दशक में) भी किसान आन्दोलन ही था. और पीछे जाएं तो नील की खेती करने वाले किसानों का संगठन महात्मा गाँधी के आन्दोलन की नींव बना थाI
स्वातन्त्र्योत्तर भारत में किसानों की समस्याओं पर जितना ध्यान दिया जान था उतना न दिया गया न ही दिया जा रहा है. हो सकता है खेती आज GDP में, सेवा और उद्योग क्षेत्र के मुक़ाबले कम योगदान कर रही हो मगर क्या इस सत्य को नकारा जा सकता है कि देश के ग्रामीण इलाकों की बहुसंख्य आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है अपने दैनिक जीवन यापन के लिए.. अब भी काफ़ी सारा इलाका चूंकि एकफ़सली है और उस पर भी मानसून की मेहरबानी पर निर्भर तो वर्ष का तकरीबन २ तिहाई भाग किसान या तो मज़दूरी करता है या फ़िर जैसे तैसे काम चलाता हैI इन परिस्थितियों को बदलने के लिए कोई तैयार नहीं.
१९८० के दशक में महेन्द्रसिंह टिकैत ने किसानों का आन्दोलन को गति दी मगर अब उनका भी ऐसा मानना है कि वैसा आन्दोलन खड़ा करना मुश्किल है क्यों कि किसान अपनी खेतीबाड़ी देखे या रोज़ रोज़ आन्दोलन का झंडा बुलन्द करेI
ऊपर जिस घटना का उल्लेख मैंने किया वह बुन्देलखन्ड के इलाके से ताल्लुक रखती है एक तो वैसे भी बुन्देलखन्ड का इलाका खनिज सन्साधन विहीन काफ़ी हद तक गैर-उपजाउ इलाका है उस पर कृषि ही यहां का मुख्य आय स्रोत है I इन परिस्थतियो में अपराध और दस्यु समस्या जन्म नहीं लेगी तो क्या भक्ति आन्दोलन की धारा बहेगी?
किसान के लिए कुछ करने का अर्थ उसको सब्सिडी की भीख देना नहीं हैI वे परिस्थितयाँ बदलिए जिन्होंने आज इस मुकाम पर हिन्दुस्तान के किसान को ला खड़ा किया हैI क्या कभी इस बात पर गम्भीरता और सहानुभूति से विचार किया गया कि बड़ी बीज कम्पनियां आ जाने के बाद छोटे किसानों का क्या होगा जिसे हर फ़सल के पहले बीज खरीदना होगा जो अब तक वह परम्परागत रूप से संग्रहण करते आ रहा थाI
दुख की बात यह है कि किसान का दर्द तो छोडिए किसान की समस्याएँ और किसान का नाम भी संचार माध्यमों में कहीं नहीं है/ क्या यह एक संयोग मात्र है कि टेलिविजन या फ़िल्मों में किसान बिल्कुल गायब है/ उसकी कहानी न दिखाई जा रही है न ही लिखी जा रही है / जो थोड़ा बहुत किसानपन है वो पंजाब के किसान की फ़ोटो. और बड़े आलीशान रेस्तराँ में मक्के की रोटी/ मगर क्या वह किसान हमारे आस-पास के किसान से मिलता जुलता मालूम पड़ता है? कम से कम मुझे तो नहींI