महान कवि भूषण
पुनर्पठन के तहत आज याद करते हैं हम रीतिकाल के महान कवि भूषण को जिनके बारे में प्रसिद्ध है कि उनकी पालकी उठाते वक़्त शिवाजी और छत्रसाल ने भी काँधा लगा दिया था/
इनका समय रहा है सत्रहवीं सदी जब सारे मुल्क के राजा नवाब और सामन्त अय्याशियों में मदमस्त हुए पड़े थे/रीतिकाल में जब सारा मुल्क़ का साहित्य संसार श्रृंगार रस में गोते लगा रहा था उसी वक़्त एक शायर ऐसा भी हुआ जिसने राजे-रजवाड़ों को उनका धर्म और कर्तव्य की याद दिलाई/
स्वाभाविक है कि यह याद दिलाना बहुत कम लोगों को ही पसन्द आया और इसी के चलते भूषण अपने मूल स्थान जो शायद दक्षिण उत्तरप्रदेश में कहीं था वहाँ से महाराष्ट्र चले आए/ यहाँ शाह शिवाजी की कीर्तिगीत रचने के साथ ही उन्होंने कभी उनको कर्तव्य की याद दिलाने में कोताही भी नहीं बरती/
भूषण के छप्पय और छन्द वीर रस से भरे हुए हैं/ उन्होंने तत्कालीन माहौल और साहित्यिक परिस्थितियों के विपरीत श्रृंगार रस का वर्णन कम ही किया है/ उनकी कविताओं में तलवार की चमक और बन्दूक की धमक है पायल की छनक नहीं/भूषण कुछ समय वीर बुन्देला छत्रसाल के दरबार में भी रहे थे और छत्रसाल की प्रशन्सा में भी उन्होने काव्य रचना की थीं/
प्रस्तुत हैं कुछ रचनाएंस्मृति पर आधारित होने की वजह से कहीं कोई त्रुटि भी हो सकती है, कृपया ध्यान दिलाने का कष्ट करें/
“इन्द्र जिमि जम्भ पर, बाड़व सुअम्भ पर, रावण सदम्भ पर रघुकुल राज है
पौन वारिवाह पर, शम्भु रतिनाह पर, ज्यों सहस्त्रबाहु पर राम द्विजराज है
दावा द्रुम दण्ड पर, गरुड़ वितुण्ड पर, मृगन के झुण्ड पर जैसे मृगराज है
कान्ह जिमि कन्स पर, तेज तम अन्स पर, त्यों मलेच्छ वन्स पर सेर सिवराज है”
मायने इस रचना के कुछ इस तरह हैं कि जैसे इन्द्र वृत्रासुर नामक राक्षस के लिए, समुद्र के लिए बाड़व अग्नि, दम्भी रावण पर राम, बादलों पर पवन, शंकर कामदेव पर, सहस्रबाहु नामके राजा पर महर्षि परशुराम, जंगल की आग वृक्षों पर, पक्षियों पर गरुड़, पशुसमूह पर शेर, कंस पर कृष्ण और अँधेरे पर रोशनी भारी होती है वैसे ही म्लेच्छ (औरंगज़ेब) के लिए शेर शिवाजी भारी हैं/
छ्न्द की दृष्टि से इस में मालोपमा अलंकार का प्रयोग है/ यानि की कई सारी तुलनाएं एक व्यक्ति के लिए की जाना/
Nand Dani said,
March 11, 2009 at 11:40 am
You are great ! I am a genuine Maharashtrian. For a long time I wanted this original text and it’s meaning. Today is an auspicious day ! I regularly watch tele-serial on Shivaji Maharaj. Please listen to Lataji’s CD ” Shivakalyan Raja”.This song is in it. I also wanted Bhushan’s other song on Shivajiraje- “Kunda Kahan Payvrund kahan…Shivaraj ke age” and it’s meaning. I will be extremely greatful to you. I wish a very long and happy life to you and your family !!!
Nand Dani
ashutosh said,
April 9, 2009 at 1:40 pm
Bahut behtar.Aaj jabki ritikavya ki baat karne ka arth durvachan ke taur par liya ja raha hai,aese me aapka sarthak lekhan hame aashwast karta hai.