तीस बरस का त्रुटिसुधार
सोचा तो ये था कि राजनीत के बवाल में पड़ेंगे कम से कम, मगर क्या करें अपने लोग इतना मैटर दे देते हैं कि बिना उन पर टिप्पणी करे मुझे अच्छी नींद आती ही नहीं/ उन लोगों को भी जब तक वो चर्चा में नहीं आते रहें नींद का आना, खाना का पचना मुश्किल होता होगा/ कुछ लोगों को तो शायद दैनिक कार्यक्रमों में भी शायद दिक्कत होती हो/ चरम अवस्था पर टहल रहे कुछ नेताओं को शायद साँस लेने में भी परेशानी महसूस होती हो अगर उनके कुछ बयान अखबारों के कागज़ को गन्दा कर के हमारा मनोरन्जन न करें/
चिर-विदूषक लालू जी एक ऐसे ही सज्जन हैं हमारे पड़ोस बिहार के रहने वाले है/ दिल्ली में रेल मन्त्रालय में बैठ के गरीब रथ की योजनाओं को अन्जाम देते रहते हैं वैसे आजकल उनका ज़्यादा समय मैनेजमेन्ट विद्यार्थियों को रेल प्रबन्धन के गुर बताने में जाता है/
अभी उनकी कुछ करीबी दोस्ती कांग्रेस से हो गई है/ और इसी झोंक में लालूजी ने बयान दे दिया कि “आपातकाल लागू करना तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए अनिवार्य था”/ इस बयान के बाद सारे कांग्रेसियों को विशेषकर परिवार के पुरानो खिदमतगारों को तत्काल सचेत हो जाना चाहिए/ हो सकता है लालूजी मैडम के दरबार में उनके खड़े होने की जगह पर निगाह गड़ा रहे हों/ लालूजी ने इतना कहकर ही दम नहीं लिया बल्कि वे समाजवादियों और जनता परिवार के पितृ-पुरुष जयप्रकाश नारायण को भी अपना अनुयायी बताने से नहीं चूके/ उनके अनुसार उन्होंने छात्र आन्दोलन शुरू करने के बाद जे.पी. को हैण्डओवर कर दिया था/ बहरहाल मुद्दे की बात ये है कि अब अर्जुनसिंह और गुलाम नबी आज़ाद जैसे पारिवारिक वफ़ादारों का क्या होगा? ये श्रीमान जी तो यहां भी घुसपैठ करने लगे/
लालू जी ने राहुल बाबा के बयानों को भी तर्कसंगत ठहराया/ वैसे भी हमारे यहाँ इतिहास के पुनर्लेखन की, पुनर्व्याख्या की परम्परा पिछली सरकारें शुरू कर गई हैं (इसी दौरान यह भी कि “क्या कभी इस बात पर गौर किया है कि हमें कभी भी पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से इमर्जेन्सी के बारे में जानकारी नहीं दी गई और न ही उस पर कभी चर्चा हुई”)/
लालू जी जिस जनता पार्टी और जे.पी. के अनुयायी होने का दावा तमाम बरसों से कर रहे हैं उसी जे.पी. और उसके आन्दोलन को उन्होंने बेमानी ठहरा दिया/ यह एक विवाद और बहस का विषय है कि क्या इमर्जेन्सी की वाकई हिन्दुस्तान को ज़रूरत थी या यह सिर्फ़ कुछ सिरफ़िरे लोगों की करतूत थी जिनके आगे तत्कालीन प्रधानमन्त्री इतनी बेबस थीं कि उन्होंने आपात्काल लागू करने के पहले गृहमन्त्री तक से सलाह करना या बताना उचित नहीं समझा/ वैसे लालूजी की धर्मनिरपेक्ष दलों से खूब पटती है और देश का सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष दल काँग्रेस ही है वैसे इसका ठेका कभी कभी कम्युनिस्ट पार्टियों को भी मिल जाता है/
बहरहाल नए समीकरण बनने का दौर है वैसे समीकरण और केमिस्ट्री तो काफ़ी दिन से बन रहे हैं आज फ़ार्मूला घोषित हुआ है और वो ये है कि “न तू कह मेरी न मैं कहूं तेरी” वैसे इस रासायनिक समीकरण से जो सबसे ज़्यादा नुकसान में रहने वाला है वो है हमारे प्रधानमन्त्री जिनको लालूजी वैसे भी भाव नहीं देते, अब तो शायद सरदार साहब को लालू –आवास पर जाना पड़ेगा/