चुनावक्षेत्रे- कुरुक्षेत्रे
आज अटल जी लखनऊ आए थे, उ.प्र. के चुनावों के परिप्रेक्ष्य में उनका ये पहला उ.प्र. प्रवास था/ राजनीतिक अभिरुचियां होने के चलते मैं नेताओं को देखने सुनने चला जात हूं फ़िर अटल जी को कभी देखा नहीं था इससे भी ज़्यादा ये आशंका थी कि फ़िर पता नहीं कब मौका मिलेगा? मिलेगा भी कि नहीं. तो मैं उन्हें देखने सुनने के लिए सभा में पहुंच गया/
सभा जैसा कि प्रायः होता है काफ़ी देर से शुरू हुई/ तमाम सारे छुटभैये नेता हमारे कानों पर अत्याचार करते रहे और हम अटल जी के चक्कर में उन्हें सुनते रहे/ तब हमें बिल्कुल समझ में आ गया कि कैसे जनता भाजपा के शासन को बर्दाश्त करके अटल जी के नाम पर वोट दे देती है/ इसी दरमियान एक सज्जन बोले कि लखनऊ के सारे बड़े बड़े नेता तो चले गए बसपा सपा में इसलिए इनको बोलने का मौका मिल रहा है/ शायद यह वर्तमान परिदॄश्य पर सटीक टिप्पणी थी/
अटल जी के साथ राजनाथ सिंह और कल्याणसिंह भी थे और स्थानीय उम्मीदवार लालजी टंडन (मायावती के राखीबन्द भाई और अटल जी के खासमखास) भी थे/जनता और कम से कम मैं तो अटल जी को सुनने का ही इन्तज़ार कर रहा था. जैसा की होता तमाम स्तुतिगान पहले हो चुके थे और फ़िर कल्याणसिंह ने अपना भाषण दिया/ उनका कहना था कि”मैने सत्ता की चादर को ज्यों की त्यों धर दिया और मुझ पर कभी कोई आरोप तक भ्रष्टाचार का नहीं लग सका” शायद वे कुसुम राय का प्रकरण भूळ गये हैं जिस पर उनकी काफ़ी छीछालेदर हुई थी और शायद वे बसपा के विधायकों को तोड़ कर अपराधियों से भरा हुआ जम्बो मन्त्रिमण्डल बनाने का रिकार्ड भी भूल गए थे/ बहरहाल उनका उद्बोधन में एक ही चीज़ उभरी कि “हम भ्रष्टाचार मुक्त अपराध मुक्त शासन देंगे”/ शायद ऐसे शासन की उ.प्र. ही नहीं सारे हिन्दुस्तान को ज़रूरत है मगर विडंबना यही है कि नेताओं को अपने ही भाषण भूलने की बीमारी लगी हुई है/
उनके बाद राजनाथसिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि “उ.प्र. में जेल का खेल चल रहा है” राजनाथ का भाषण कुछ अच्छॆ बिन्दु लिये हुए था और उन्होने मज़बूती से अपनी बात रखी/
इसके बाद भाषण हुआ माननीय अटल जी का/यह भाषण उनके वयाधिक्य और स्मृतिविभ्रम का परिचायक सिद्ध हुआ/ शुरू होते ही एक बुजुर्गवार बोले कि “बेटा जब तक ये बुड्ढा है तब तक ही भाजपा है” बहरहाल यह भविष्य के गर्भ में है मगर जिन लोगों को उन की दहाड़ संसद में सुनने का मौका मिला है और जिन्होने उनके विद्वत्ता, वाग्वैदग्ध्य, वाग्मिता और वाक्पटुता से भरे हुए भाषण सुने हैं उनके लिए यह निराशाजनक था/ अटल जी खड़े तो हो नहीं पाते है और यह स्थिति उनकी भाजपा के भीतर भी है अब वे सिर्फ़ आराम करते हैं/
अटल जी ने कहा ”मेरा कल्याणसिंह जी से कोई मतभेद नहीं है” हालाँकि बात पक्की है कि अटल जी अपने राजनीतिक दुश्मनों को बख्शते नहीं हैं चाहे वे पं. मौलिचन्द्र शर्मा और बलराज मधोक (जनसंघ) या फ़िर गोविन्दाचार्य/ फ़िर कल्याणसिंह को वे कैसे माफ़ कर सकते है जिन्होंने भाजपा छोड़ते वक्त अटल जी को तमाम गालियाँ दी थीं/उनको भाषण के दौरान पूरा समय प्रोम्पटिंग की जाती रही तब कहीं जाके वे अपना लगभग १५ मिनिट का भाषण पूरा दे सके/ निश्चित रूप से उनकी उम्र में ऐसे हालात पैदा होना कोई अचरज वाली बात नहीं है/
एक ज़माना था जब उनकी सभाओं में नारा लगता था ”अटलबिहारी बोल रहा है, इन्द्रा शासन डोल रहा है” मगर अब वो बात रह नहीं गई है/ यह वह व्यक्ति है जिसने अपनी क्षिप्र वाग्मिता के बल पर प्रधानमन्त्रित्व तक का सफ़र तय किया/
अटल जी को पूरा समय बार बार निर्देशित किया जाता रहा/ जिस व्यक्ति की भाषण कला हज़ारों-लाखों लोगों के लिये प्रेरक रही हो उसका भाषण के दौरान विषय से भटकाव होता रहा/ भाषा के जबर्दस्त ज्ञाता अधूरे वाक्य और अनुपयुक्त शब्दों का इस्तेमाल करता रहा/ निश्चित रूप से उन्हें सुनना बहुत सुखद नहीं था/ सन १९९८ के चुनावों का वाकिया है अटल जी से सोनिया जी के चुनाव प्रचार में उमड़ रही भीड़ के बावत पूछा गया/ अटल जी बोले “जनता उन्हें देखने आती है मुझे सुनने के लिये आती है” मगर आज वही स्थिति अटल जी की हो गई है/ वय, स्वास्थ्य और अन्य समस्याओं के चलते ही सही हिन्दुस्तान की राजनीति का यह धुरन्धर खिलाड़ी और महारथी आज शरशय्या पर प्रतीत हुआ/