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	<title>Comments on: जय काली कलकत्ते वाली</title>
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	<description>संवाद-प्रवाह</description>
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		<title>By: Ajit Kumar Mishra</title>
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		<dc:creator>Ajit Kumar Mishra</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Apr 2008 06:16:05 +0000</pubDate>
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		<description>महोदय, मुझे भी कई बार कलकत्ता जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया और हर बार मैं कालीघाट मंदिर में भी गया परन्तु आप शायद शनिवार के दिन गये होगें इसीलिये इतनी भीड़ मिली। वैसे भक्ति और भीड़ के बीच एक अजब सी कशमकस रहती है। जैसे यदि किसी मंदिर में भीड़ न हो तो यह कहा जाता है कि इस मन्दिर की मान्यता नहीं और भीड़ हो तो कहा जाता कि इतनी भीड़ में दर्शन करने की हिम्मत नहीं।

इसके बाद मैं आता हुँ आस्था पर । किसी वस्तु वैज्ञानिकों ने दो गुड़ बताये है। (1) भौतिक गुण जैसे प्रत्येक पदार्थ छोटे -2 कणो (Particle) से बना है। दूसरा गुण है रासायनिक जिसके माध्यम से यह देखा जाता है कि रासायनिक संरचना कैसी है। मेरे विचार से किसी भी पदार्थ के दो गुण और भी होते है जिसमें पहला गुण दृष्यत्मक गुण अर्थात विभिन्न संयोजन के बाद वह कैसा दिखता है। जैसे शादी विवाह में विजली की सजावट जो कि किसी एक दिशा में चलती हुई प्रतीत होती है जबकि वास्तव में बल्ब केवल जलते बुझते है। इसके बाद जो मेरे विचार से सबसे महत्वपूर्ण गुण है वह है आस्थागत् या भावनात्मक । भावनात्मक गुण की बजह से हर पदार्थ की स्थित और सम्मान हर व्यक्ति के लिए अलग-2 होती जैसे घर अन्दर किसी बुजुर्ग की तस्वीर, कहने को तो वह केवल कागज और विभिन्न रंगो का संजोजन मात्र है परन्तु उस व्यक्ति के मन में उस तस्वीर के प्रति उतना ही सम्मान है जितना कि उस बुजुर्ग के प्रति है।  इसी तरह विभिन्न मंदिरो में लगी हुई देवी देवताओं की प्रतीक मूर्तियाँ का यदि आप भौतिक गुण देखेगें तो आपको पत्थर इत्यादि ही दिखेगें परन्तु आस्थागत् तौर आपको उसमें अपने इष्ट ही दिखेगें । अब यह आप पर है कि आप भौतिक दृष्टि से देखते हैं या आध्यत्मिक दृष्टि से।

अंत मे मैं यही कहना चाहता हूँ कि यह मेरे बिल्कुल व्यक्तिगत् विचार है तथा इनका कोई धार्मिक या ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है। तथा यदि सहमति ने तो  इसको किसी विवाद का विषय न बनाया जाये। साथ यदि किसी की भावनायें आहत हूई हो तो क्षमा चाहता हूँ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>महोदय, मुझे भी कई बार कलकत्ता जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया और हर बार मैं कालीघाट मंदिर में भी गया परन्तु आप शायद शनिवार के दिन गये होगें इसीलिये इतनी भीड़ मिली। वैसे भक्ति और भीड़ के बीच एक अजब सी कशमकस रहती है। जैसे यदि किसी मंदिर में भीड़ न हो तो यह कहा जाता है कि इस मन्दिर की मान्यता नहीं और भीड़ हो तो कहा जाता कि इतनी भीड़ में दर्शन करने की हिम्मत नहीं।</p>
<p>इसके बाद मैं आता हुँ आस्था पर । किसी वस्तु वैज्ञानिकों ने दो गुड़ बताये है। (1) भौतिक गुण जैसे प्रत्येक पदार्थ छोटे -2 कणो (Particle) से बना है। दूसरा गुण है रासायनिक जिसके माध्यम से यह देखा जाता है कि रासायनिक संरचना कैसी है। मेरे विचार से किसी भी पदार्थ के दो गुण और भी होते है जिसमें पहला गुण दृष्यत्मक गुण अर्थात विभिन्न संयोजन के बाद वह कैसा दिखता है। जैसे शादी विवाह में विजली की सजावट जो कि किसी एक दिशा में चलती हुई प्रतीत होती है जबकि वास्तव में बल्ब केवल जलते बुझते है। इसके बाद जो मेरे विचार से सबसे महत्वपूर्ण गुण है वह है आस्थागत् या भावनात्मक । भावनात्मक गुण की बजह से हर पदार्थ की स्थित और सम्मान हर व्यक्ति के लिए अलग-2 होती जैसे घर अन्दर किसी बुजुर्ग की तस्वीर, कहने को तो वह केवल कागज और विभिन्न रंगो का संजोजन मात्र है परन्तु उस व्यक्ति के मन में उस तस्वीर के प्रति उतना ही सम्मान है जितना कि उस बुजुर्ग के प्रति है।  इसी तरह विभिन्न मंदिरो में लगी हुई देवी देवताओं की प्रतीक मूर्तियाँ का यदि आप भौतिक गुण देखेगें तो आपको पत्थर इत्यादि ही दिखेगें परन्तु आस्थागत् तौर आपको उसमें अपने इष्ट ही दिखेगें । अब यह आप पर है कि आप भौतिक दृष्टि से देखते हैं या आध्यत्मिक दृष्टि से।</p>
<p>अंत मे मैं यही कहना चाहता हूँ कि यह मेरे बिल्कुल व्यक्तिगत् विचार है तथा इनका कोई धार्मिक या ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है। तथा यदि सहमति ने तो  इसको किसी विवाद का विषय न बनाया जाये। साथ यदि किसी की भावनायें आहत हूई हो तो क्षमा चाहता हूँ।</p>
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		<title>By: अजीत कुमार मिश्रा</title>
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		<dc:creator>अजीत कुमार मिश्रा</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Apr 2008 12:40:26 +0000</pubDate>
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		<description>महोदय, मुझे भी कई बार कलकत्ता जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया और हर बार मैं कालीघाट मंदिर में भी गया परन्तु आप शायद शनिवार के दिन गये होगें इसीलिये इतनी भीड़ मिली। वैसे भक्ति और भीड़ के बीच एक अजब सी कशमकस रहती है। जैसे यदि किसी मंदिर में भीड़ न हो तो यह कहा जाता है कि इस मन्दिर की मान्यता नहीं और भीड़ हो तो कहा जाता कि इतनी भीड़ में दर्शन करने की हिम्मत नहीं। 

इसके बाद मैं आता हुँ आस्था पर । किसी वस्तु वैज्ञानिकों ने दो गुड़ बताये है। (1) भौतिक गुण जैसे प्रत्येक पदार्थ छोटे -2 कणो (Particle) से बना है। दूसरा गुण है रासायनिक मेरे विचार से किसी भी</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>महोदय, मुझे भी कई बार कलकत्ता जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया और हर बार मैं कालीघाट मंदिर में भी गया परन्तु आप शायद शनिवार के दिन गये होगें इसीलिये इतनी भीड़ मिली। वैसे भक्ति और भीड़ के बीच एक अजब सी कशमकस रहती है। जैसे यदि किसी मंदिर में भीड़ न हो तो यह कहा जाता है कि इस मन्दिर की मान्यता नहीं और भीड़ हो तो कहा जाता कि इतनी भीड़ में दर्शन करने की हिम्मत नहीं। </p>
<p>इसके बाद मैं आता हुँ आस्था पर । किसी वस्तु वैज्ञानिकों ने दो गुड़ बताये है। (1) भौतिक गुण जैसे प्रत्येक पदार्थ छोटे -2 कणो (Particle) से बना है। दूसरा गुण है रासायनिक मेरे विचार से किसी भी</p>
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