गायकी का अलग अन्दाज़- शोभा गुर्टू
आर्कुट नाम की चीज़ से जो मुझे सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ वो ये कि तमाम सारा शास्त्रीय संगीत उपलब्ध हुआ सुनने के लिये/कुछ दिन पहले श्रीमती शोभा गुर्टू जी की कुछ ठुमरियां डाउनलोड की/ शोभा जी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की महान गायिकाओं में से रही हैं उनकी मां मेनकाबाई शिरोड़्कर भी बड़ी गायिका थीं/ शोभा जी ने मुख्यतः उपशास्त्रीय गाया है यानि कि दादरा ठुमरी, चैती और कजरी मगर उपशास्त्रीय के लिये भी तालीम और रियाज़ में कोई छूट की गुन्जाइश है नहीं/शोभा जी लगभग २ वर्ष पूर्व दिवंगत हो गईं ७८ साल की उम्र में, मगर उनका संगीत विचक्षण है हालांकि उनके संगीत की तकनीकी बारीकियां तो सुर-ताल के महारथी ही जानें मगर अपने को सुनने में जो अच्छा लगे वही बढ़िया लगता है/ उन्हें ठुमरी की साम्राज्ञी की उपाधि दी गई हालांकि उनसे पहले भी कई गायिकाओं ने उपशास्त्रीय गाया है और समकालीन में भी गा रही हैं, मगर वह बुलन्द आवाज़ और खुले गले की गायकी शोभा जी की विशेषता है/ जिन मित्रों का शास्त्रीय संगीत से थोड़ा दूर का नाता है उनके लिये बता दूं कि फ़िल्म “मैं तुलसी तेरे आंगन की” में “सैयां रूठ गये” और “प्रहार” में “याद पिया की आये” ठुमरियां शोभा जी ने ही गाई है/ कभी मौका मिले तो ज़रूर सुनें एक अलग मज़ा आयेगा.शास्त्रीय संगीत की तकनीकी बारीकियों से अनभिज्ञ हमारे जैसे लोग भी आनन्द उठा सकते हैं इसका/ उस्ताद विलायत खान साहब फ़रमा गये हैं कि “ठुमरी गाने के लिये तो अल्लाह मियां एक दिल देवें तभी सुनने में मज़ा आता है” तो ठुमरी है भाव की गायकी/ भाव जितना ज़्यादा सही तरीके से और जिस तीव्रता से श्रोता तक पहुंचता है वही गायकी की सफ़लता मानी जाती है/ इस विषय पर थोड़ी गप-शप और मन्थन फ़िर कभी/
Akhand said,
April 15, 2007 at 4:53 am
Bhai tumhari rachna ka intezaar hai besabri…
aur badi khushi hui ki aap punah chitta shuru kar rahe ho