देहभाषा की रणनीति

इन दिनों टी.वी. पर देखने के लिये कोई भी चैनल लगाइये तो एक जैसा ही सब कुछ नज़र आता है/ सारे चैनल वालों, यहाँ तक कि बुद्धिजीविता की अलम्बरदार NDTV को यह विश्वास हो चुका है कि जनता कुछ और देखना नहीं चाहती सिर्फ़ साँप, नागिन रहस्य रोमांच और तान्त्रिक विद्याओं का सीधा प्रसारण देखना चाहती है/ सीधा यानि लाइव और लाइव से तो करेन्ट लगता है न/ इन्हीं लाइव शोज़ की जमात में एक और नाम जुड़ा है रियल्टी शोज़ का/ एक ऐसा ही रियल्टी शो प्रसारित हो रहा है आजकल MTV पर जिसका नाम है Splitsvilla/ इसमें 20 बालाएँ 2 लड़्कों को पटाने के लिये फ़्लर्ट कर रही हैं/ इसको कहा जा रहा है रोमान्स रियल्टी शो/ यह तो बाद की बात है कि इस रोमान्स में प्यार-व्यार टाइप की चीज़ कितनी होगी अभी तो सब का दिमाग जीतने पर मिलने वाले पैसे में लगा हुआ है/ सवाल यह है कि क्या लड़कियाँ सिर्फ़ एक प्रोडक्ट है जिनका काम सिर्फ़ लड़्कों को यानि कि अपने सम्भावित टारगेट क्लाइन्ट्स को आकर्षित करना है? क्या ऐसे कार्यक्रम और शो नारी की गरिमा के प्रतिकूल नहीं हैं? नारी या पुरुष की बात नहीं मानव की गरिमा के प्रतिकूल हैं/
हालाँकि यह साफ़ कर देना मौज़ूँ होगा कि अपन कोई धर्मध्वजी नहीं हैं ना ही भारतीय संस्कॄति के पतन की चिन्ता हमको सता रही है/
बिना नारीवाद का झण्डा बुलन्द किये और मोमबत्ती वाले प्रदर्शनकारियों की जमात में शामिल हुये भी यह सवाल मुझे सता रहा है/ यह सवाल सिर्फ़ एक कार्यक्रम से उपज पड़ा हो ऐसा तो नहीं है मगर सब प्रकार के कार्यक्रमों में, विज्ञापनों में और सबसे बड़ी बात विचारसंकुल में यह कन्सेप्ट या अवधारणा गहरे तक पैठते जा रही है/ आधुनिक आर्थिक क्रान्तिकारी परिवर्तनों के चलते यह विश्वास बन रहा है कि औरत ज़्यादा आजाद, सक्षम और स्वनिर्भर हो रही है जिसके चलते शायद दुनियाँ रहने के लिये एक बेहतर जगह होगी, मगर फ़िर वही जन्ज़ीरें किसी दूसरे नाम से डाली जा रही हैं और दुख की बात यह है कि इन पर सवाल भी नहीं उठाए जा रहे/
शायद ही कोई ऐसा विज्ञापन हो या कार्यक्रम हो जिसमे लड़कियों को यह धर्मादेश की भाँति बार बार न बताया जात हो कि तुमको गोरा होना है, खूबसूरत दिखना है और बाकी सब चीज़ें गईं भाड़ में ऐसे युवाओं से अगर किसी दिन हिन्दुस्ताने के प्रदेशों के नाम पूछ लो तो हवा सटक जाए/ सारी की सारी रणनीति सिर्फ़ देहभाषा तक सिमटती प्रतीत होती है/ चार्वाक के दर्शन क मतलब तो अब पता चल रहा है साब/ हालाँकि भौतिकता में कोई बुराई नहीं है/ ओशो बाबा की कुछ बातें जो मुझे ठीक लगती हैं उनमें एक यह भी है कि “हिन्दुस्तान वैसे ही आध्यात्मिकता के चक्कर में फ़ँस के बहुत कुछ गँवा चुका है, अरे उस लोक को सुधारने के पहले इस लोक को तो सुधारो/”
मगर अतिशयता तो इसकी भी बुरी ही है न/ दर-असल खूबसूरत दिखना कोई बुराई नहीं है मगर खूबसूरत दिखने का ख़ब्त हो जाना बीमारी है/ यह बीमारी हमारे यहाँ बेहिसाब तरीके फ़ैल रही है मानो कि हैज़ा हो/ बीमारी का मतलब आपके शरीर के सारे सन्साधन, स्रोत सब इसी की पूर्ति में लग जाते हैं उससे होने वाले क्षय और क्षरण को निवर्तन में/ इसी तरह इस खब्त में भी आपके सारे मानसिक शारीरिक स्रोत ऊर्जा आवेश सब सुन्दर दिखने में ही खर्च हो रहा है/ परेशानी का सबब यह है कि इन सबके चलते सामाजिक दायित्व, और समाज के साथ सन्निकटता क ज़बर्दस्त ह्रास हो रहा है/ और खुब्सूरत किसलिये दिखना ताकि लड़के आप पर आकर्षित हों और कुछ दिन फ़िदा रहें/
एक प्रायोजित प्रक्रम चल रहा है कि घुमा फ़िरा के यह बात समझा दी जाए कि बिना खूबसूरत दिखे तुम दुनियाँ में रहने लायक नहीं हो/ विशेषकर साँवला या काले रंग की लड़कियाँ या जिनके नैन नक्श अन्ग्रेज़ों सरीखे न हों/ यह बात समझने वाली है कि हिन्दुस्तान का आदमी सौन्दर्य के अगर ग्रीक मानदण्ड अपनाएगा तो काम चलने वाला नहीं है/ लैटिन सौन्दर्य में गोरे रंग नीली आँखों का महत्व हो सकता है मगर क्या ज़रूरी है कि ग्लोब के इस हिस्से में भी उन्हीं परिभाषाओं में सार्वत्रिक सत्य का संज्ञान कर लिया जाए? दर-असल सुन्दर दिखने में बुराई या अच्छाई वाली बात नहीं है/ सवाल यह है कि इन तमाम सारी चीज़ों के चलते जो हीन-भावना और ग्रन्थि तेज़ी से उत्तप्त की जा रही है बनिस्पत तथाकथित कम सुन्दर लड़कियों में, उसका हर्ज़ा कौन देगा? यह मूल कन्सेप्ट हो गया है हर एक विज्ञापन में, शो में, सीरियल्स में, जहाँ से हिन्दुस्तान गायब होता जा रहा है और इन्डिया छाता जा रहा है/ जिनमें कोई भी युवा लैटिनो से कम नज़र नही आना चाहता/
कुछ दिन से एक और आयाम जुड़ा है कि आज का बच्चा आज का भी उपभोक्ता है और कल का पक्का उपभोक्ता है/ कुछ दिन पहले एक एड देखा जिसमें छोटी सी बालिका को लम्बे घुँघराले बालों का महत्व समझाया जाता है और निष्कर्ष यह कि अमुक शैम्पू सबसे अच्छा है/ यदि बालमन में भी यह सब दिन रात बैठाते रहा जाएगा तो हमारे यहाँ नागरिक नहीं सिर्फ़ उपभोक्ता पैदा होंगे/
अपने साथ यह समस्या है कि बात कहाँ से शुरू हुई और कहाँ पहुँच जाती है/ बहरहाल ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगे ये तो कहने का दुस्साहस मै नही करूंगा मगर सोचने की बात यह है कि तथाकथित आज़ादी की हिमायती महिलाएँ ऐसे कार्यक्रमों पर चुप क्यों है जिनका उद्देश्य महिलाओं को सिर्फ़ एक उत्पाद और कमोडिटी के तौर पर पेश करना है/  

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